पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यदा) = जब (विष्णुः) = यह उदारवृत्ति का पुरुष [विषु व्याप्तौ ] (ते ओजसा) = हे प्रभो ! आप के ओज से, बल से (त्रीणि पदा विचक्रमे) = तीन पदों को रखता है। अर्थात् आपकी उपासना से आपके सम्पर्क में आता हुआ शक्तिशाली बनकर शरीर में तेजस्वी, मन में सब के प्रति हित की भावनावाला व मस्तिष्क में प्राज्ञ बनता है (आत् इत्) = तब शीघ्र ही (हर्यता हरी) = ये गतिशील इन्द्रियाश्व (ते ववक्षतुः) = आपके समीप हमें प्राप्त कराते हैं। [२] प्रभु की उपासना से पूर्व जीव उन्नति न कर सकने के कारण 'वामन' [बौना] -सा होता है। प्रभु की उपासना उसे 'विष्णु' [ व्यापक] बनाती है। यह शरीर में तैजस, मन में वैश्वानर व मस्तिष्क में प्राज्ञ बनता है। यही इसके तीन पद हैं। यह पुरुष अपनी इन्द्रियों से सत्कर्मों को करता हुआ प्रभु के समीप प्राप्त होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम उदारवृत्ति के बनते हुए जीवन में तीन पदों को रखें । तैजस, वैश्वानर व प्राज्ञ बनें। इन्द्रियों से सन्मार्ग का आक्रमण करते हुए प्रभु के समीप प्राप्त हों।