पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र के अनुसार स्तुतिवाणियों से प्रभु का अपने में वर्धन करनेवाले व प्रभु को प्राप्त करनेवाले अनुभव करते हैं कि अस्य इस प्रभु की (प्रणीतयः) = प्रणीतियाँ, उत्कृष्ट मार्ग पर अपने सखा को ले चलने के क्रम, (मही:) = अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। (उत) = और (प्रशस्तयः) = प्रभु की प्रशस्तियाँ-स्तुतियाँ (पूर्वी:) = हमारा पालन व पूरण करनेवाली हैं। इन स्तुति-वाणियों से हमें जीवन के उत्कृष्ट मार्ग की प्रेरणा मिलती है। [२] इस प्रभु के स्तोता (दाशुषे) = दाश्वान् पुरुष के लिये (विश्वा वसूनि) = सब वसु (व्यानशुः) = विशेष रूप से प्राप्त होते हैं। दाश्वान् पुरुष प्रभु के प्रति अपने को दे डालनेवाला यह उपासक, सब वसुओं को प्राप्त करता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम प्रभु प्रेरणा के अनुसार चलें। प्रभु का शंसन करें। प्रभु के प्रति अपना अर्पण करनेवाले बनें। हम सब वसुओं [धनों] को प्राप्त करेंगे।