पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यज्ञवाहसम्) = सब यज्ञों के प्राप्त करानेवाले उस प्रभु को (यज्ञेभिः) = यज्ञों से (वावृधुः) = बढ़ाते हैं और (व्यानशुः) = प्राप्त करते हैं। यज्ञों से दिव्य भाव का उत्तरोत्तर वर्धन होता है और (अन्ततः) = हम यज्ञों को प्राप्त करानेवाले प्रभु को प्राप्त करते हैं। [२] (सोमेभिः) = सोमों के रक्षण के द्वारा (सोमपातमम्) = अधिक से अधिक सोम का रक्षण करनेवाले उस प्रभु को हम अपने अन्दर बढ़ाते हैं और उसे प्राप्त करते हैं। [३] यज्ञों के द्वारा वासनाओं का विनाश होता है, यज्ञशील पुरुष वासनाओं से बचा रहकर सोम का रक्षण करता है। सोमरक्षण से ज्ञानाग्नि दीप्त होती है। ये दीप्त ज्ञानाग्निवाले पुरुष (होत्राभिः) = ज्ञान की वाणियों से (इन्द्रम्) = उस परमैश्वर्यशाली प्रभु को अपने अन्दर बढ़ाते हैं और अन्ततः प्रभु को प्राप्त होते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम यज्ञशील हों, यह यज्ञशीलता हमें वासनाओं से बचाये। सोमरक्षण द्वारा दीप्त ज्ञानाग्निवाले होकर हम स्तोतों द्वारा उस परमैश्वर्यशाली प्रभु की महिमा का वर्धन करें और प्रभु को प्राप्त होनेवाले हों।