पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो ! (यत्) = जब आप (विष्णवि) = [विष् व्याप्तौ] व्यापक उदार हृदयवाले पुरुष में (सोमम्) = सोम को (सं मन्दसे) = प्रशंसित करते हैं। (यद्वा) = अथवा (घ) = निश्चय से (त्रिते) = [त्रीन् तनोति] 'ज्ञान, कर्म, उपासना' तीनों का विस्तार करनेवाले में आप सोम को प्रशंसित करते हैं, (आप्त्ये) = आप्तों में उत्तम पुरुषों में आप इस सोम को प्रशंसित करते हैं। अर्थात् यह सोमरक्षण ही उन्हें 'विष्णु, त्रित व आप्त्य' बनाता है। एक पुरुष में उदारता [विष्णु] 'ज्ञान, कर्म, उपासना' तीनों के विस्तार [त्रित] व आप्तता को देखकर और इन बातों को सोममूलक जानकर लोग सोम का प्रशंसन तो करेंगे ही। [२] (यद् वा) = अथवा हे इन्द्र ! आप (मरुत्सु) = इन प्राणसाधक पुरुषों में (इन्दुभिः) = इन सुरक्षित सोमकणों से (संमन्दसे) = [To shine] चमकते हैं। सोमकणों का संरक्षण ज्ञानाग्नि को दीप्त करता है, यह बुद्धि को तीव्र बनाता है। इस तीव्र बुद्धि से प्रभु का दर्शन होता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण से हम उदार हृदय, ज्ञान, कर्म, उपासना का विस्तार करनेवाले व आप्त बनते हैं। प्राणसाधना के होने पर सुरक्षित हुआ हुआ सोम ही हमें प्रभु-दर्शन के योग्य बनाता है।