पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यम्) = जिस ज्ञान को (विप्राः) = अपना विशेषरूप से पूरण करनेवाले, (उक्थवाहसः) = स्तोत्रों का धारण करनेवाले (आयवः) = गतिशील मनुष्य (अभिप्रमन्दुः) = प्रशंसित करते हैं, जिस ज्ञान की महिमा का प्रतिपादन ये 'विप्र-उक्थवाहस्- आयु' करते हैं, मैं उस (घृतं न) = घृत के समान 'मलक्षरण व दीप्ति' को प्राप्त करानेवाले ज्ञान को (आसनि) = अपने मुख में (पिप्ये) = आप्यायित करता हूँ। उस ज्ञान को अपने में आप्यायित करता हूँ, (यत्) = जो (ऋतस्य) = सत्य का है। [२] प्रभु से दिया गया वेदज्ञान 'सत्य ज्ञान' है, इसे मैं अपने अन्दर बढ़ाने का प्रयत्न करता हूँ। बढ़ा तभी पाता हूँ जब मैं 'विप्र उक्थवाहस् व आयु' बनता हूँ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हमारे में अपना पूरण करने की वृत्ति हो, स्तुति को हम करनेवाले बनें, गतिशील हों। ऐसा होने पर हम सत्य ज्ञान को देनेवाली वेदवाणी को धारण करेंगे। यह हमारे मलों का क्षरण करती हुई हमें दीप्त जीवनवाला बनायेगी।