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व॒चो॒विदं॒ वाच॑मुदी॒रय॑न्तीं॒ विश्वा॑भिर्धी॒भिरु॑प॒तिष्ठ॑मानाम् । दे॒वीं दे॒वेभ्य॒: पर्ये॒युषीं॒ गामा मा॑वृक्त॒ मर्त्यो॑ द॒भ्रचे॑ताः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

vacovidaṁ vācam udīrayantīṁ viśvābhir dhībhir upatiṣṭhamānām | devīṁ devebhyaḥ pary eyuṣīṁ gām ā māvṛkta martyo dabhracetāḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

व॒चः॒ऽविद॑म् । वाच॑म् । उ॒त्ऽई॒रय॑न्तीम् । विश्वा॑भिः । धी॒भिः । उ॒प॒ऽतिष्ठ॑मानाम् । दे॒वीम् । दे॒वेभ्यः॑ । परि॑ । आ॒ऽई॒युषी॑म् । गाम् । आ । मा॒ । अ॒वृ॒क्त॒ । मर्त्यः॑ । द॒भ्रऽचे॑ताः ॥ ८.१०१.१६

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:101» मन्त्र:16 | अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:8» मन्त्र:6 | मण्डल:8» अनुवाक:10» मन्त्र:16


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'स्तुति ज्ञान व कर्म' की प्रतिपादिका वेद- धेनु

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (वचोविदम्) = स्तुतिवचनों को प्राप्त कराती हुई, (वाचमुदीरयन्तीम्) = ज्ञान की वाणियों का उच्चारण करती हुई, (विश्वाभिः धीभिः उपतिष्ठमानाम्) = सब ज्ञानपूर्वक किये जानेवाले कर्मों के हेतु से उपस्थित होती हुई, अर्थात् सब कर्मों का ज्ञान देती हुई, (देवीम्) = इस प्रकाशमयी (गाम्) = वेदवाणी रूप गौ को (दभ्रचेताः) = नासमझ अल्प चेतनावाला पुरुष (मा परि आ अवृक्त) = सर्वथा परित्यक्त मत करे, इसका स्वाध्याय अवश्य करे ही। [२] यह वेदवाणी रूप गौ (देवेभ्यः एयुषीम्) = देवों के लिये प्राप्त होनेवाली है। हम देववृत्ति के बनेंगे तो अवश्य इस वेदवाणी को प्राप्त करेंगे। या देवों से ही प्राप्त होती है। 'आचार्य देवो भव' आचार्यों को देवतुल्य आदर देते हुए हम उनसे इस वेदवाणी को प्राप्त करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - यह वेदवाणी रूप गौ स्तुति ज्ञान तथा कर्म तीनों का ज्ञान देती है। इसको नासमझ ही परित्यक्त करता है। समझदार व्यक्ति देवों से इसे प्राप्त करने के लिये यत्नशील होता है। यह देवों के सम्पर्क में आनेवाला व्यक्ति 'प्रयोग' (प्रकृष्ट मेलवाला) कहाता है। यह 'भार्गव' है, बुद्धि का परिपाक करनेवाला । निरन्तर आगे बढ़ने से 'अग्नि' है। ज्ञानियों का शिष्यत्व स्वीकार करनेवाला 'बार्हस्पत्य' है। ज्ञान के द्वारा जीवन की पवित्रता का साधक यह 'पावक' है। शक्ति का सम्पादन करके यह 'गृहपति' बनता है, गृह का रक्षक । बुराइयों को पृथक् करनेवाला यह ' यविष्ठ' होता है। यह 'अग्नि' नाम से प्रभु का आराधन करता है-
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Vak is the eternal Word, the Language, bottom less reservoir of omniscience, inspirer of human lan guage and communication, closely and conscientiously studied and served by all intelligent scholars of the world: this divine gift revealed for the pious and wise, holy as mother, as earth, as the cow, as divinity, come as a blessing to me, no mortal should neglect. If a mor tal neglects this mother language, he remains but piti fully ignorant and poor in the mind.