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प्र॒जा ह॑ ति॒स्रो अ॒त्याय॑मीयु॒र्न्य१॒॑न्या अ॒र्कम॒भितो॑ विविश्रे । बृ॒हद्ध॑ तस्थौ॒ भुव॑नेष्व॒न्तः पव॑मानो ह॒रित॒ आ वि॑वेश ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

prajā ha tisro atyāyam īyur ny anyā arkam abhito viviśre | bṛhad dha tasthau bhuvaneṣv antaḥ pavamāno harita ā viveśa ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्र॒ऽजाः । ह॒ । ति॒स्रः । अ॒ति॒ऽआय॑म् । ई॒युः॒ । नि । अ॒न्याः । अ॒र्कम् । अ॒भितः॑ । वि॒वि॒श्रे॒ । बृ॒हत् । ह॒ । त॒स्थौ॒ भुव॑नेषु । अ॒न्तरिति॑ । पव॑मानः । ह॒रितः॑ । आ । वि॒वे॒श॒ ॥ ८.१०१.१४

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:101» मन्त्र:14 | अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:8» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:10» मन्त्र:14


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

तिस्रः प्रजाः - अन्याः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (ह) = निश्चय से (तिस्रः प्रजाः) = ' पुत्रैषणा, वित्तैषणा व लोकैषणा' रूप तीन एषणाओं के अन्दर चलनेवाली (तिस्रः प्रजाः)= ये तीन प्रकार की प्रजायें (अति आयम्) = अतिशयेन गति को, आवागमन को जन्म-मरण के चक्र को (ईयुः) = प्राप्त होती हैं। (अन्याः) = इन एषणाओं से ऊपर उठ जानेवाली दूसरी प्रजायें (अर्क अभितः) = उस अर्चनीय [पूजनीय] परमात्मा के चारों ओर प्रभु के समीप (निविविश्रे) = निवेशवाली होती हैं। ये प्रभु की भक्ति में प्रवृत्त होती हैं । [२] ये प्रजायें प्रभु का स्मरण इस रूप में करती हैं कि वह (बृहत्) = महान् प्रभु (ह) = निश्चय से (भुवनेषु अन्तः) = सब लोकों व प्राणियों के अन्दर (तस्थौ) = स्थित हैं। (पवमानः) = सब प्रजाओं को पवित्र करनेवाले वे प्रभु (हरितः आविवेश) = सब दिशाओं में व्याप्त हैं। कोई भी स्थान प्रभु की व्याप्ति से पृथक् नहीं है। ये सर्वव्यापक प्रभु हमारे अन्दर भी व्याप्त होकर हमें पवित्र कर रहे हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - एषणात्रय में चलनेवाली प्रजायें आवागमन के चक्र से ऊपर नहीं उठ पातीं। प्रभु के उपासक ही पवित्र जीवनवाले बनकर ब्रह्मलोक को प्राप्त करते हैं। आवागमन के चक्र से ये ही बच पाते हैं।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Three orders of evolutionary creation, sattva or thought, rajas or energy, and tamas or matter, and three regions of the cosmos, heaven, earth and the middle regions proceed to expansive existence at the beginning of the Being manifesting into Becoming, and others, all biological forms depend upon the self-refulgent sun. The infinite spirit of divinity abides immanent in the cosmos, and pure, and sanctifying all forms, manifests in all directions of space and greenery of the earth.