वांछित मन्त्र चुनें

स॒मु॒द्रे अ॒न्तः श॑यत उ॒द्ना वज्रो॑ अ॒भीवृ॑तः । भर॑न्त्यस्मै सं॒यत॑: पु॒रःप्र॑स्रवणा ब॒लिम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

samudre antaḥ śayata udnā vajro abhīvṛtaḥ | bharanty asmai saṁyataḥ puraḥprasravaṇā balim ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

स॒मु॒द्रे । अ॒न्तरिति॑ । श॒य॒ते॒ । उ॒द्ना । वज्रः॑ । अ॒भिऽवृ॑तः । भर॑न्ति । अ॒स्मै॒ । स॒म्ऽयतः॑ । पु॒रःऽप्र॑स्रवणाः । ब॒लिम् ॥ ८.१००.९

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:100» मन्त्र:9 | अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:5» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:10» मन्त्र:9


0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

[ प्रभु प्राप्ति के तीन उपाय ] समुद्र में प्रभु का शयन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] वह प्रभु (समुद्रे अन्तः) [स+मुद् ] = प्रसादयुक्त हृदय में, (मनः) प्रसादवाले व्यक्ति में (शयते) = शयन करता है। प्रभु का निवास प्रसन्न हृदय में ही तो होता है। वह (वज्रः) = क्रियाशील प्रभु (उद्ना) = शरीरस्थ रेतःकण रूप जलों के द्वारा (अभीवृतः) = आभिमुख्येन वृत होता है, रेतःकणों का रक्षक पुरुष ही प्रभु का वरण कर पाता है। [२] (अस्मै) = इस प्रभु की प्राप्ति के लिये (संयतः) = संयमवाले पुरुष, (पुरः प्रस्रवणा:) = आगे और आगे गतिवाले पुरुष (बलिं भरन्ति) = उत्तम कर्मों के उपहार को प्राप्त कराते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु प्राप्ति का उपाय यह है कि - [क] हम मन को प्रसादयुक्त [निर्मल] करें, [ख] शरीर में रेत : कणों का रक्षण करें, [ग] कर्त्तव्य कर्मों को करने के द्वारा प्रभु का अर्चन करें।
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - In the liquid vitalities of the body system surrounded by living waters, the virile vitality of the spirit, the vajra, resides in the human body. For this vitality, streams of energy flowing forth in the veins and nerves bear and bring contributive forms of physical and pranic nourishment of the spirit for the soul’s rise to divinity.