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प्र सु स्तोमं॑ भरत वाज॒यन्त॒ इन्द्रा॑य स॒त्यं यदि॑ स॒त्यमस्ति॑ । नेन्द्रो॑ अ॒स्तीति॒ नेम॑ उ त्व आह॒ क ईं॑ ददर्श॒ कम॒भि ष्ट॑वाम ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pra su stomam bharata vājayanta indrāya satyaṁ yadi satyam asti | nendro astīti nema u tva āha ka īṁ dadarśa kam abhi ṣṭavāma ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्र । सु । स्तोम॑म् । भ॒र॒त॒ । वा॒ज॒ऽयन्तः॑ । इन्द्रा॑य । स॒त्यम् । यदि॑ । स॒त्यम् । अस्ति॑ । न । इन्द्रः॑ । अ॒स्ति॒ । इति॑ । नेमः॑ । ऊँ॒ इति॑ । त्वः॒ । आ॒ह॒ । कः । ई॒म् । द॒द॒र्श॒ । कम् । अ॒भि । स्त॒वा॒म॒ ॥ ८.१००.३

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:100» मन्त्र:3 | अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:4» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:10» मन्त्र:3


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु में पूर्ण विश्वास-व प्रभु-स्तवन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (वाजयन्तः) = शक्ति की कामना करते हुए तुम (इन्द्राय) = उस परमैश्वर्यशाली प्रभु के लिये (स्तोमम्) = स्तुति को (प्र सु भरत) = प्रकर्षेण सम्पादित करो। (सत्यं अस्ति) = यदि प्रभु सत्य हैं, तो उनके लिये (सत्यम्) = सत्य ही स्तोम का सम्पादन करो। हृदय में प्रभु सत्ता की सत्यता में विश्वास करते हुए तुम प्रभु का हृदय से सच्चा ही स्तवन करो। [२] (नेमः उ त्वः) = अधूरे ज्ञानवाला ही कोई व्यक्ति [त्व:] (इति आह) = यह कहता है कि (इन्द्रः न अस्ति) = परमैश्वर्यशाली प्रभु नहीं है । (कः ईं ददर्श) = किसने इस प्रभु को देखा है ? (कं अभिष्टवाम्) = किसका स्तवन हम करें? [३] अपरिपक्वता में ऐसे ही विचार उठते हैं। धीमे-धीमे तपस्या की अग्नि में परिपक्व होने पर ज्ञान वृद्धि के परिणामस्वरूप वह संसार के प्रत्येक पदार्थ में प्रभु की सत्ता का अनुभव करने लगता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु के लिये हृदय से सचमुच स्तवन करो, प्रभु सत्ता में पूर्ण विश्वास रक्खो । ज्ञान की अपरिपक्वता के स्थिति में प्रभु की सत्ता में सन्देह होने लगता है।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O seekers of strength, power and progress in life, offer worship and adoration in honour of Indra if it is your faith in heart and soul that reality is the truth and Indra is the reality. Only some one of raw and sceptical understanding would say: Indra is non-existent, who saw him? And if none saw Indra, who and why should we adore and worship?