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सखे॑ विष्णो वित॒रं वि क्र॑मस्व॒ द्यौर्दे॒हि लो॒कं वज्रा॑य वि॒ष्कभे॑ । हना॑व वृ॒त्रं रि॒णचा॑व॒ सिन्धू॒निन्द्र॑स्य यन्तु प्रस॒वे विसृ॑ष्टाः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

sakhe viṣṇo vitaraṁ vi kramasva dyaur dehi lokaṁ vajrāya viṣkabhe | hanāva vṛtraṁ riṇacāva sindhūn indrasya yantu prasave visṛṣṭāḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सखे॑ । वि॒ष्णो॒ इति॑ । वि॒ऽत॒रम् । वि । क्र॒म॒स्व॒ । द्यौः । दे॒हि । लो॒कम् । वज्रा॑य । वि॒ऽस्कभे॑ । हना॑व । वृ॒त्रम् । रि॒णचा॑व । सिन्धू॑न् । इन्द्र॑स्य । य॒न्तु॒ । प्र॒ऽस॒वे । विऽसृ॑ष्टाः ॥ ८.१००.१२

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:100» मन्त्र:12 | अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:5» मन्त्र:6 | मण्डल:8» अनुवाक:10» मन्त्र:12


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रकाश की प्राप्ति

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (सखे) = मित्र (विष्णो) = व्यापक प्रभो ! (वितरं विक्रमस्व) = हमारे शत्रुओं पर खूब ही आक्रमण करिये। इन काम-क्रोध आदि शत्रुओं को विनष्ट करके (द्यौः देहि) = प्रकाश को दीजिये । तथा (वज्राय विष्कभे) = क्रियाशीलतारूप वज्र को धारण करने के लिये (लोकम्) = प्रकाश को प्राप्त कराइये। आप से दिये गये प्रकाश में हम अपने कर्त्तव्यपथ को सम्यक् देखनेवाले हों। [२] हे प्रभो ! आप से मिलकर हम (वृत्रं हनाव) = वृत्र का विनाश कर पायें, काम का विध्वंस कर सकें। काम विध्वंस द्वारा (सिन्धून्) = ज्ञानप्रवाहों को (रिणचाव) = गतिवाला करें। हमारी तो एक ही कामना है कि (विसृष्टाः) = काम आदि शत्रुओं के बन्धन से मुक्त हुए हमारे सब बन्धु (इन्द्रस्य प्रसवे) = उस शासक प्रभु अनुज्ञा में (यन्तु) = गतिवाले हों। प्रभु की आज्ञानुसार सब वर्तनेवाले हों।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु हमारे शत्रुओं का अत्यन्त विनाश करें। प्रकाश को प्राप्त करायें। उस प्रकाश करें। के अनुसार हम कर्म करें। प्रभु के साथ मिलकर वासना को विनष्ट करें, ज्ञानप्रवाहों को प्रवृत्त सब लोग वासनामुक्त होकर प्रभु के निर्देश के अनुसार चलें। वासनाओं से मुक्ति के कारण यह 'जमदग्नि' बनता है, खूब दीप्त जाठराग्निवाला व प्रज्वलित यज्ञाग्निवाला यह 'मित्रावरुणौ' को अपने अनुकूल करने के लिये यत्नशील होता है-
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O friend, O soul progressive like universal Vishnu’s presence, act and advance to redeem your divinity. O light of heaven, give more light and space for the virile vitality of the soul to settle, consolidate and rise. Then we, the human and the immanent divine, together, shall eliminate evil, darkness and suffering from life, release the inhibited streams of life to flow freely, and the floods of human potential may then, we pray, flow abundantly in the blissful yajnic creation of Indra.