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अध॒ प्लायो॑गि॒रति॑ दासद॒न्याना॑स॒ङ्गो अ॑ग्ने द॒शभि॑: स॒हस्रै॑: । अधो॒क्षणो॒ दश॒ मह्यं॒ रुश॑न्तो न॒ळा इ॑व॒ सर॑सो॒ निर॑तिष्ठन् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

adha plāyogir ati dāsad anyān āsaṅgo agne daśabhiḥ sahasraiḥ | adhokṣaṇo daśa mahyaṁ ruśanto naḻā iva saraso nir atiṣṭhan ||

पद पाठ

अध॑ । प्लायो॑गिः । अति॑ । दा॒स॒त् । अ॒न्यान् । आ॒ऽस॒ङ्गः । अ॒ग्ने॒ । द॒शऽभिः॑ । स॒हस्रैः॑ । अध॑ । उ॒क्षणः॑ । दश॑ । मह्य॑म् । रुश॑न्तः । न॒ळाःऽइ॑व । सर॑सः । निः । अ॒ति॒ष्ठ॒न् ॥ ८.१.३३

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:1» मन्त्र:33 | अष्टक:5» अध्याय:7» वर्ग:16» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:1» मन्त्र:33


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शिव शंकर शर्मा

परमात्मा सर्वदानों से श्रेष्ठ दश प्रकार के इन्द्रिय दान देता है, यह इससे दिखलाया जाता है।

पदार्थान्वयभाषाः - (अध) और (अग्ने) हे सर्वव्यापक परमात्मन् ! तू (प्लायोगिः) सर्वप्रयोगवित् और (आसङ्गः) सर्वान्तर्य्यामी सर्वगत है। और (अन्यान्+अति) सांसारिक अन्य दाताओं से कहीं बढ़कर (दशभिः) दशगुणित (सहस्रैः) और सहस्रों गुण दानों से युक्त तू इन्द्रियाख्य अनुपम अद्भुत दश पदार्थ (मह्यम्) मुझको देता है। (अध) तथा जो दान (दश) दश=अर्थात् पाँच ज्ञानेन्द्रिय और पाँच कर्मेन्द्रिय हैं और (उक्षणः) सर्व कार्य के सेचन में परम समर्थ हैं और (रुशन्तः) देदीप्यमान हैं अर्थात् रोगादिकों से दूषित नहीं है, पुनः (सरसः) सरोवर के तटपर निकले हुए (नलाः+इव) नल नाम के तृण के समान (निरतिष्ठन्) इस शरीर से निकलकर शोभायमान हो रहे हैं, इससे बढ़कर कोई अन्य दान नहीं, यह तेरी महती कृपा और महादान है ॥३३॥
भावार्थभाषाः - यह ईश्वर समस्त प्रयोग जानता है। इस एक पृथिवी पर कई लक्ष कई एक कोटि व्यक्तियाँ दीखती हैं, वे सब ही परस्पर कुछ न कुछ भेद रखती हैं। प्रथम मनुष्य की ओर देखिये। सम्प्रति इस पृथिवी पर जितने मनुष्य हैं, उन सबों के मुखों की आकृति भिन्न-भिन्न है। इसी प्रकार किसी एक ग्राम के समस्त पशुओं को देखिये, सबका मुख एकसा नहीं। सहस्रों पशुओं में से अपने पशु को गवाँर चरवाह भी पहचान लेता है। कहाँ तक मैं लिखूं, सर्वव्यक्ति परस्पर भिन्न-भिन्न मुखाकृति से युक्त है। क्या यह महामहाश्चर्य की बात नहीं। इस विचित्र रचना को जो रचता रहता है, वह कितने प्रयोगों को जानता है, इसको कौन वर्णन कर सकता है। इसी कारण वह वेद में प्लायोगि=प्रयोगविद् कहा गया है। हे मनुष्यो ! वह सर्वज्ञ है। सर्व वस्तुओं में निवास करता है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि विद्वान् उपासकों या सर्व प्राणियों के अभीष्टों को भी जानता है, इसमें सन्देह नहीं। किन्तु यह न्यायवान् है। अतः सबको निज-२ कर्मानुसार वह पुष्कल दान दे रहा है। सबसे बढ़कर वह कृपानिधि मनुष्यों को उन दानों से भूषित कर देता है, जिनके तुल्य अन्य दान जगत् में नहीं हैं। और जिन दानों से ग्रहीता अद्भुत-२ कार्य कर सकते हैं। वे दान कहीं अन्यत्र नहीं। इसी शरीर में विद्यमान हैं। वे पाँच कर्मेन्द्रिय और पाँच ज्ञानेन्द्रिय हैं। हे मनुष्यो ! इन दशों दानों को यदि तुम कोटिदान समझो, तो भी थोड़ा ही समझते हो। यदि इन दानों को ऐसी-२ कोटि पृथिवी के समान समझते तो भी इस दान के माहात्म्य को नहीं समझते हो। समस्त पृथिवी पर के पदार्थ इस दान के अर्ध खर्वांश के तुल्य नहीं हैं। वे दान तुमको मिले हुए हैं। उनको कार्य में लाकर जितना धन चाहो, उतना कमालो और हे मनुष्यो ! इस अद्भुत दानदाता के निकट सदा कृतज्ञ बने रहो। यह शिक्षा वेद भगवान् इससे देते हैं ॥३३॥
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आर्यमुनि

अब परमात्मपरायण कर्मयोगी का महत्त्व कथन करते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे परमात्मन् ! (अध) आपसे ऐश्वर्यलाभ करने पर (प्लायोगिः) अनेक प्रयोग करनेवाला (आसङ्गः) आपके ऐश्वर्य्य में चित्त लगानेवाला कर्मयोगी (दशभिः, सहस्रैः) दशसहस्र योद्धाओं के साथ आये हुए (अन्यान्) शत्रुओं को (अति) अतिक्रमण करने में समर्थ (दश, उक्षणः) आनन्द की वृष्टि करनेवाले दश वीरों को (मह्यं) मेरे लिये (दासत्) दे (अध) और वे वीर (रुशन्तः) बलबुद्धि से देदीप्यमान हुए (सरसः) सरोवर से (नला इव) नड=तृणविशेष के समान (निः, अतिष्ठन्) संगत होकर उपस्थित हों ॥३३॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में कर्मयोगी का पराक्रम वर्णन किया गया है कि परमात्मपरायण कर्मयोगी नाना प्रकार के प्रयोगों द्वारा अपनी अस्त्र-शस्त्रविद्या को इतना उन्नत कर लेता है कि सहस्रों मनुष्यों की शक्तियों को भस्मीभूत तथा चूर्ण कर सकता है, इसलिये परमात्मोपासन में प्रवृत्त हुए पुरुष को उचित है कि वह अस्त्र-शस्त्रविद्या में निपुण हो ॥३३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

दश उक्षणः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अध) = अब यह (प्लायोगिः) = प्रकर्षेण कर्मयोग के मार्ग पर चलनेवाला (आसंग) = [आ असंगः] विषयों में अनासक्त पुरुष (अन्यान्) = अपने से भिन्न, विरोधी, काम आदि शत्रुओं को (अतिदासत्) = अतिशयेन विनष्ट करता है। [२] अग्रे हे प्रभो ! (अध) = अब कामादि शत्रुओं का विनाश करने पर (सहस्त्रैः) = आनन्दमय (दशभिः) = दसों इन्द्रियों के साथ (मह्यम्) = मेरे लिये (दश) = दस (उक्षणः) = शक्ति का मेरे में सेचन करनेवाले (रुशन्तः) = चमकते हुए प्राण [प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान, नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त, धनञ्जय] (सरसः) = तालाब से (नडाः इव) तृणविशेषों की तरह (निरतिष्ठन्) = निकलकर स्थित होते हैं। वस्तुतः शरीर तालाब है तो दश प्राण उससे उत्पन्न होकर उसमें स्थित होनेवाले दश तृणविशेष हैं। इनके द्वारा शरीर में शक्ति का सेचन होता है, ये ही शरीर में सोमकणों की ऊर्ध्वगति का कारण बनते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-कर्मों में व्यापृत उपासक काम आदि शत्रुओं का विनाश करता है। इसकी इन्द्रियाँ निर्मल होती हैं और इसके प्राण शरीर में शक्ति की ऊर्ध्वगति का कारण बनते हैं।
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शिव शंकर शर्मा

परमात्मा सर्वदानेभ्यः श्रेष्ठानि इन्द्रियादीनि दानानि ददातीत्यनया दर्शयति।

पदार्थान्वयभाषाः - हे अग्ने=सर्वव्यापक परमात्मन् ! त्वम्। अध=अथ। अन्यान्=सांसारिकान् दातॄन्। अति=अतिक्रम्य। दशभिः=दशगुणितैः। सहस्रैः=सहस्रसंख्याकैर्गुणैः= दानैर्युक्तः सन्। दासत्=दाससि। इन्द्रियाख्यान् अद्भुतान्=अनुपमान् पदार्थान्। मह्यं ददासीत्यर्थः। यैस्तुल्यानि नान्यानि दानानि भवितुमर्हन्ति। अत्र प्रथमपुरुषश्छान्दसः। कीदृशस्त्वम्। प्लायोगिः=प्रकर्षेण आसमन्तात् सर्वाणि वस्तूनि यो युनक्ति तस्मिन् तस्मिन् कार्य्ये योजयति स प्रायोगिः। रलयोः समानता। सर्वप्रयोगविदित्यर्थः। पुनः। आसङ्गः=स्वसृष्टेषु पदार्थेषु य आसङ्गतोऽस्ति। यद्यपि परमात्मा असङ्गोऽस्ति तथापि सर्वव्यापकत्वात् सर्वान्तर्य्यामित्वाद् आसङ्गोऽप्युच्यते। अध=अथ। तव प्रदत्ताः। रुशन्तो=देदीप्यमानाः। दश=दशसंख्याका ज्ञानकर्मेन्द्रियाख्याः। उक्षणः= सर्वकार्यसेचनसमर्थाः पदार्थाः। सरसः=तटाकाद्। नलाः इव=तटोद्भवास्तृणविशेषा इव। तव कृपया। अस्मात् शरीरात्। निरतिष्ठन्=निर्गत्य तिष्ठन्ति=प्रकाशन्ते। इयं तव महती कृपा महादानञ्च ॥३३॥
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आर्यमुनि

अथ परमात्मपरायणकर्मयोगिणो महत्त्वं कथ्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे परमात्मन् ! (अध) अथ त्वत्सकाशात् लब्धैश्वर्यः (प्लायोगिः) प्रयोगात्सिद्धिमापन्नः सः (आसङ्गः) ईश्वरे चेतः सज्जनशीलः कर्मयोगी (दशभिः, सहस्रैः) दशसहस्रसंख्याकैः सह (अन्यान्, अति) शत्रून् अतिक्रमितुं शक्तान् (दश, उक्षणः) दशसंख्याकान्वीरान् (मह्यं) मदर्थं (दासत्) ददाति (अध) अथ च ते वीराः (रुशन्तः) दीप्यमानाः (सरसः) सरःसकाशात् (नला इव) नडास्तृणविशेषा इव (निः, अतिष्ठन्) निःसृत्य संगता भवन्ति ॥३३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, omnipresent light of life, the dedicated man of charity conducting yajnic and spiritual projects in science and spirituality exceeds others by tens and thousands especially when he gives to me ten highly brilliant and creative gifts rising like lotus from a lake.