पदार्थान्वयभाषाः - पदार्थ- हे (नरा) = नायको! हे स्त्री-पुरुषो! हे (इन्द्र-विष्णू) = विद्युत्, जल को वर्षाने हारे, सूर्य वा पवन के समान लोकोपकारक जनो! जैसे विद्युत् तथा मेघ को वर्षानेवाले तुम दोनों मिलकर (सूर्यम्) = सूर्य, (उषासम्) = और उसकी दाहिका ताप शक्ति को (जनयन्ता) = उत्पन्न करते हुए (यज्ञाय) = तत्त्वों के परस्पर मिलने के लिये (उरुं लोकं चक्रथुः) = विशाल स्थान अन्तरिक्ष को उपयोगी बनाते हो और (वृषशिप्रस्य दासस्य) = वर्षक जल-स्वरूप जलवाले मेघ की (माया:) = नाना रचनाओं को (पृतनाज्येषु) = जलों के निमित्त आघात करते वैसे ही आप दोनों, (सूर्यम्) = सूर्य तुल्य तेजस्वी और (उषासम्) = उषा के तुल्य कान्तियुक्त विदुषी और (अग्निम्) = अग्नि तुल्य ज्ञानप्रकाशक विद्वान् को प्रकट करते हुए (यज्ञाय) = परस्पर दान, प्रतिदान, सत्संगादि के लिये (उरुं लोकं चक्रथुः उ) = विशाल गृहादि स्थान बनाओ और (पृतनाज्येषु) = संग्रामों में (वृष- शिप्रस्य) = बलवान् नेतावाले (दासस्य) = प्रजानाशक शत्रु जन की (माया:) = कुटिल चालों का (जघ्नथुः) = नाश करो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- लोकोपकार करनेवाले विद्वान् पुरुष व विदुषी स्त्रियाँ राष्ट्र को उन्नतिशील बनाने के लिए सौर ऊर्जा, यज्ञ द्वारा वर्षा कराने की विद्या, उन्नत गृहों भवनों के निर्माण की तकनीक तथा शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने के लिए अस्त्र-शस्त्र निर्माण की कला आदि के वैज्ञानिक आविष्कार करें।