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उ॒रुं य॒ज्ञाय॑ चक्रथुरु लो॒कं ज॒नय॑न्ता॒ सूर्य॑मु॒षास॑म॒ग्निम् । दास॑स्य चिद्वृषशि॒प्रस्य॑ मा॒या ज॒घ्नथु॑र्नरा पृत॒नाज्ये॑षु ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

uruṁ yajñāya cakrathur u lokaṁ janayantā sūryam uṣāsam agnim | dāsasya cid vṛṣaśiprasya māyā jaghnathur narā pṛtanājyeṣu ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उ॒रुम् । य॒ज्ञाय॑ । च॒क्र॒थुः॒ । ऊँ॒ इति॑ । लो॒कम् । ज॒नय॑न्ता । सूर्य॑म् । उ॒षस॑म् । अ॒ग्निम् । दास॑स्य । चि॒त् । वृ॒ष॒ऽशि॒प्रस्य॑ । मा॒याः । ज॒घ्नथुः॑ । न॒रा॒ । पृ॒त॒नाज्ये॑षु ॥ ७.९९.४

ऋग्वेद » मण्डल:7» सूक्त:99» मन्त्र:4 | अष्टक:5» अध्याय:6» वर्ग:24» मन्त्र:4 | मण्डल:7» अनुवाक:6» मन्त्र:4


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (उरुं) इस विस्तृत (लोक) लोक को परमात्मा ने (यज्ञाय) यज्ञ के लिये (चक्रथुः) उत्पन्न किया है और उसी ने (सूर्य्यम् उषसमग्निम्) उषा काल की ज्योतिवाले अग्निरूप सूर्य्य को रचा है। आप (पृतनाज्येषु) युद्धों में (दासस्य) कपटी लोगों को जो (वृषशिप्रस्य) दम्भ से काम लेते हैं, उनके (मायाः) कपट को (जघ्नथुः) नाश करें, (नरा) नरा शब्द यहाँ नेता के अभिप्राय से आया है। द्विवचन यहाँ व्यत्यय से अविवक्षित है ॥४॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा प्रार्थनाकर्त्ताओं के द्वारा इसको प्रकट करते हैं कि न्यायाभिलाषी पुरुषों ! तुम मायावी पुरुषों की माया के नाश करने के लिये प्रार्थनारूपी भाव को उत्पन्न करो, फिर यह सत्कर्म्म स्वयं प्रबल हो करके फल देगा ॥४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

वैज्ञानिकों के कर्त्तव्य

पदार्थान्वयभाषाः - पदार्थ- हे (नरा) = नायको! हे स्त्री-पुरुषो! हे (इन्द्र-विष्णू) = विद्युत्, जल को वर्षाने हारे, सूर्य वा पवन के समान लोकोपकारक जनो! जैसे विद्युत् तथा मेघ को वर्षानेवाले तुम दोनों मिलकर (सूर्यम्) = सूर्य, (उषासम्) = और उसकी दाहिका ताप शक्ति को (जनयन्ता) = उत्पन्न करते हुए (यज्ञाय) = तत्त्वों के परस्पर मिलने के लिये (उरुं लोकं चक्रथुः) = विशाल स्थान अन्तरिक्ष को उपयोगी बनाते हो और (वृषशिप्रस्य दासस्य) = वर्षक जल-स्वरूप जलवाले मेघ की (माया:) = नाना रचनाओं को (पृतनाज्येषु) = जलों के निमित्त आघात करते वैसे ही आप दोनों, (सूर्यम्) = सूर्य तुल्य तेजस्वी और (उषासम्) = उषा के तुल्य कान्तियुक्त विदुषी और (अग्निम्) = अग्नि तुल्य ज्ञानप्रकाशक विद्वान् को प्रकट करते हुए (यज्ञाय) = परस्पर दान, प्रतिदान, सत्संगादि के लिये (उरुं लोकं चक्रथुः उ) = विशाल गृहादि स्थान बनाओ और (पृतनाज्येषु) = संग्रामों में (वृष- शिप्रस्य) = बलवान् नेतावाले (दासस्य) = प्रजानाशक शत्रु जन की (माया:) = कुटिल चालों का (जघ्नथुः) = नाश करो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- लोकोपकार करनेवाले विद्वान् पुरुष व विदुषी स्त्रियाँ राष्ट्र को उन्नतिशील बनाने के लिए सौर ऊर्जा, यज्ञ द्वारा वर्षा कराने की विद्या, उन्नत गृहों भवनों के निर्माण की तकनीक तथा शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने के लिए अस्त्र-शस्त्र निर्माण की कला आदि के वैज्ञानिक आविष्कार करें।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (उरुम्) इमं विस्तृतं (लोकम्) भुवनमीश्वरः (यज्ञाय) यज्ञं कर्तुं (चक्रथुः) कृतवान् स एव च (सूर्यम्, उषसम्, अग्निम्) उषोविशिष्टमग्निरूपसूर्यम् (जनयन्ता) अररचत्, भवान् (पृतनाज्येषु) युद्धेषु (दासस्य) छद्मवतः (वृषशिप्रस्य) यो हि दम्भेन साधकस्तस्य (मायाः) कपटं (जघ्नथुः) नाशयतु (नरा) हे नेतर्भगवन् !॥४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra-Vishnu, lord omnipotent and omnipresent, leader and maker of the world, creating the sun, dawn and fire you make up this vast world for yajna, evolution and expansion of things at the level of nature and humanity. You also destroy the wiles and crookedness of negative powers even though they be strong and well armed, in close battles among human forces.