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देवता: इन्द्र: ऋषि: वसिष्ठः छन्द: त्रिष्टुप् स्वर: धैवतः

प्रेन्द्र॑स्य वोचं प्रथ॒मा कृ॒तानि॒ प्र नूत॑ना म॒घवा॒ या च॒कार॑ । य॒देददे॑वी॒रस॑हिष्ट मा॒या अथा॑भव॒त्केव॑ल॒: सोमो॑ अस्य ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

prendrasya vocam prathamā kṛtāni pra nūtanā maghavā yā cakāra | yaded adevīr asahiṣṭa māyā athābhavat kevalaḥ somo asya ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्र । इन्द्र॑स्य । वो॒च॒म् । प्र॒थ॒मा । कृ॒तानि॑ । प्र । नूत॑ना । म॒घऽवा॑ । या । च॒कार॑ । य॒दा । इत् । अदे॑वीः । अस॑हिष्ट । मा॒याः । अथ॑ । अ॒भ॒व॒त् । केव॑लः । सोमः॑ । अ॒स्य॒ ॥ ७.९८.५

ऋग्वेद » मण्डल:7» सूक्त:98» मन्त्र:5 | अष्टक:5» अध्याय:6» वर्ग:23» मन्त्र:5 | मण्डल:7» अनुवाक:6» मन्त्र:5


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्रस्य) विद्वान् के (प्रथमा, कृतानि) पहले किये हुए वीर्यकर्मों को तथा (या) जिन (नूतना) नवीन कर्मों को (मघवा) ऐश्वर्यसम्पन्न विद्वान् ने (प्र, चकार) किया, उनको (प्र, वोचम्) वर्णन करते हैं, (यदा) जब इसने (अदेवीः, मायाः) आसुरी प्रकृति को (असहिष्ट, इत्) दृढ़रूप से सह लिया अर्थात् उसके वशीभूत न हुआ, तब (केवलः, सोमः) केवल सोम अर्थात् शील (अस्य, अभवत्) इसका सहायक हुआ ॥५॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे विद्वानों ! जो पुरुष आसुरी माया के बन्धन ने नहीं आता, उसके बल और यश को सम्पूर्ण संसार वर्णन करता है और उसकी दृढ़ता और परमात्मपरायणता उसको आपत् समय में भी सहायता देती है, इसलिये तुम ऐसा व्रत धारण करो कि छल, कपट, दम्भ के कदापि वशीभूत न होओ। इस दृढ़ता के लिये मैं तुम्हारा सहायक होऊँगा ॥५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सेनापति के मुख्य कर्त्तव्य

पदार्थान्वयभाषाः - पदार्थ - (इन्द्रस्य) = शत्रुहन्ता सेनापति के (प्रथमा) = मुख्य (कृतानि) = कर्त्तव्यों को मैं (प्र वोचम्) = कहता हूँ | (मघवा) = ऐश्वर्यवान् या जिन (नूतना) = नये-नये कार्यों को (चकार) = करे, उनको (प्र वोचं) = अच्छी प्रकार कहूँ। (यत्) = जब वह (अदेवीः मात्रा:) = दुष्ट पुरुषों के कपट कृत्यों को भी (असहिष्ट) = पराजित करे (अथ) = अनन्तर (सोम:) = यह ऐश्वर्ययुक्त राष्ट्र (केवल:) = केवल (अस्य अभवत्) = उसी अधीन हो जाता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सेनापति राष्ट्र को ऐश्वर्यशाली बनाने के लिए राष्ट्र रक्षा की नयी-नयी योजनाएँ बनावे। सेना को सदृढ़ बनाने तथा युद्ध-साधनों को तैयार एवं सुसज्जित करने के कार्य करे। राष्ट्र के अन्दर भी जो दुष्ट लोग राष्ट्र को दुर्बल करने के कपटपूर्ण कार्य करे या शत्रु राष्ट्र के गुप्तचर कोई छल करें तो उनको भी शक्ति के साथ विफल करे। इन सब कार्यों का वह स्वयं नियन्त्रण करे।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्रस्य) विदुषः (प्रथमा, कृतानि) पूर्वं सम्पादितानि (या) यानि च (नूतना) नूतनानि कर्माणि (मघवा) ऐश्वर्यशाली विद्वान् (प्र, चकार) अकरोत् तानि (प्रवोचम्) वर्णयामि (यदा) यत्रकाले (अदेवीः, मायाः) आसुरीं प्रकृतिं (असहिष्ट, इत्) सोढवानयं तदा (केवलः, सोमः) एक एव सौम्यस्वभावः (अस्य, अभवत्) अस्य विदुषोभूत् सहायः ॥५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Let me thus proclaim and celebrate the exploits of Indra, those accomplished earlier and the latest which the illustrious hero has achieved when he challenged and frustrated the evil designs of the crafty enemies and became the sole winner of the soma of honour and fame.