आ दैव्या॑ वृणीम॒हेऽवां॑सि॒ बृह॒स्पति॑र्नो मह॒ आ स॑खायः । यथा॒ भवे॑म मी॒ळ्हुषे॒ अना॑गा॒ यो नो॑ दा॒ता प॑रा॒वत॑: पि॒तेव॑ ॥
ā daivyā vṛṇīmahe vāṁsi bṛhaspatir no maha ā sakhāyaḥ | yathā bhavema mīḻhuṣe anāgā yo no dātā parāvataḥ piteva ||
आ । दैव्या॑ । वृ॒णी॒म॒हे॒ । अवां॑सि । बृह॒स्पतिः॑ । नः॒ । म॒हे॒ । आ । स॒खा॒यः॒ । यथा॑ । भवे॑म । मी॒ळ्हुषे॑ । अना॑गाः । यः । नः॒ । दा॒ता । प॒रा॒ऽवतः॑ । पि॒ताऽइ॑व ॥ ७.९७.२
आर्यमुनि
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
पदार्थ - (यः) = जो (नः) = हमें (पिता इव) = पिता तुल्य (परावतः) = दूर-दूर से, वा परम पद से (दाता) = सब सुख ऐश्वर्यादि दाता है वह (बृहस्पतिः) = ब्रह्माण्ड का पालक (नः) = हमें (आ महे) = सब प्रकार से देता है। हे (सखायः) = मित्रो ! हम उस (मीढुषे) = ऐश्वर्य सुखों के वर्षक प्रभु के प्रति (यथा) = जैसे हो (अनागाः भवेम) = निरपराध हों, इसीलिये हम (दैव्यानि अवांसि) = सर्वप्रकाशक प्रभु के दिये बलों, ऐश्वर्यों और रक्षाओं को (आ वृणीमहे) = चाहते हैं।
