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बृ॒हदु॑ गायिषे॒ वचो॑ऽसु॒र्या॑ न॒दीना॑म् । सर॑स्वती॒मिन्म॑हया सुवृ॒क्तिभि॒: स्तोमै॑र्वसिष्ठ॒ रोद॑सी ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

bṛhad u gāyiṣe vaco suryā nadīnām | sarasvatīm in mahayā suvṛktibhiḥ stomair vasiṣṭha rodasī ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

बृ॒हत् । ऊँ॒ इति॑ । गा॒यि॒षे॒ । वचः॑ । अ॒सु॒र्या॑ । न॒दीना॑म् । सर॑स्वतीम् । इत् । म॒ह॒य॒ । सु॒ऽवृ॒क्तिऽभिः॑ । स्तोमैः॑ । व॒सि॒ष्ठ॒ । रोद॑सी॒ इति॑ ॥ ७.९६.१

ऋग्वेद » मण्डल:7» सूक्त:96» मन्त्र:1 | अष्टक:5» अध्याय:6» वर्ग:20» मन्त्र:1 | मण्डल:7» अनुवाक:6» मन्त्र:1


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आर्यमुनि

अब उक्त विद्या को नदी का रूपक बोध कर वर्णन करते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (नदीनां) नदियों में से जो प्रफुल्लित पुष्पित करनेवाली है और (असूर्य्या) बलवाली है, उस (वचः) वाणी को (वसिष्ठ) हे विद्वन् ! (गायिषे) तू गायन कर (बृहत्) और (रोदसी) द्यु और पृथ्वीलोक में (सरस्वतीं, इत्) सरस्वती विद्या की ही तुम लोग (महय) पूजा करो और वह पूजा (सुवृक्तिभिः) निर्दोष (स्तोमैः) यज्ञों से करो ॥१॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे विद्वन् लोगों ! आपके लिये पूजायोग्य एकमात्र सरस्वती विद्या है, उसकी पूजा करनेवाला विद्वान् कदापि अवनति को प्राप्त नहीं होता, किन्तु सदैव अभ्युदय को प्राप्त होता है। तात्पर्य यह है कि सत्कर्तव्य एकमात्र परमात्मा का ज्ञान है, उसी का नाम (ब्रह्मविद्या) सरस्वती व ज्ञान है, क्योंकि विद्या, ज्ञान, सरस्वती ये तीनों पर्य्याय शब्द हैं। परमात्मा का ज्ञान तादात्म्यसम्बन्ध से परमात्मा में रहता है, इसलिये वह भी परमात्मा का रूप है, इसलिये यहाँ जड़ोपास्ति का दोष नहीं आता ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

ईश्वर की स्तुति वेद के सूक्तों से करें

पदार्थान्वयभाषाः - पदार्थ- हे (वसिष्ठ) = विद्वन् ! तू (रोदसी) = भूमि और सूर्य दोनों में नायक और (नदीनाम् असुर्या) = नदियों में बलवती नदी के तुल्य समृद्ध प्रजाओं में बलशाली, प्रभु की (वृहत् उ गायिषे) = बहुत स्तुति कर । (सुवृक्तिभिः) = स्तुति, (स्तोमैः) = वेद-सूक्तों और यज्ञादि से (सरस्वतीम् इत् महय) = जो अनादि काल से ज्ञान, सुख, ऐश्वर्य का प्रवाह बहा रहा है उसे (महय) = पूज।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- विद्वान् पुरुष ईश्वर की स्तुति व यज्ञादि कार्य अनादिकाल से चली आ रही वेदवाणी के सूक्तों से किया करे। इससे ज्ञान, सुख और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।
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आर्यमुनि

अथोक्तविद्यां नदीरूपेण वर्ण्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - (नदीनाम्) नदीनां मध्ये याः फलपुष्पसम्पादिकाः तथा (असुर्य्या) बलवत्यः  ताः (वचः) वाणीः (वसिष्ठ) हे विद्वन् ! (गायिषे) स्तुहि (सुवृक्तिभिः) सुप्रयोगैः (रोदसी) द्युपृथ्वीलोकयोः (सरस्वतीम्) विद्याम् (इत्) एव (महय) वर्द्धय (स्तोमैः) यज्ञैश्च ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O brilliant sage, sing and celebrate in lofty song Sarasvati, most powerful stream of heaven and earth among streams of life, glorify her in holy poems by homage and reverence in yajnas.