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मा कस्य॑ नो॒ अर॑रुषो धू॒र्तिः प्रण॒ङ्मर्त्य॑स्य । इन्द्रा॑ग्नी॒ शर्म॑ यच्छतम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

mā kasya no araruṣo dhūrtiḥ praṇaṅ martyasya | indrāgnī śarma yacchatam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

मा । कस्य॑ । नः॒ । अर॑रुषः । धू॒र्तिः । प्रण॑क् । मर्त्य॑स्य । इन्द्रा॑ग्नी॒ इति॑ । शर्म॑ । य॒च्छ॒त॒म् ॥ ७.९४.८

ऋग्वेद » मण्डल:7» सूक्त:94» मन्त्र:8 | अष्टक:5» अध्याय:6» वर्ग:18» मन्त्र:2 | मण्डल:7» अनुवाक:6» मन्त्र:8


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्राग्नी) हे कर्मयोगी, ज्ञानयोगी विद्वानों ! (कस्य) किसी (अररुषो मर्त्यस्य) दुष्ट मनुष्य का भी (नः) हमको (धूर्तिः) अनिष्ट चिन्तन करनेवाला (मा प्रणक्) मत बनाएँ और (शर्म) शमविधि (यच्छतं) दें ॥८॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे जिज्ञासु जनों ! तुम अपने विद्वानों से ‘शमविधि’ की शिक्षा लो अर्थात् तुम्हारा मन किसी में भी दुर्भावना का पात्र न बने, किन्तु तुम सबके कल्याण की सदैव इच्छा करो। इस भाव को अन्यत्र भी वर्णन किया है कि “मित्रस्य मा चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम्” यजु० तुम सबको मित्रता की दृष्टि से देखो ॥८॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सुदृढ़ शासन व्यवस्था

पदार्थान्वयभाषाः - पदार्थ - हे (इन्द्राग्नी) = सूर्यवत्, अग्निवत् तेजस्विन्! आप दोनों (नः शर्म यच्छतम्) = हमें सुख दो। (कस्य) = किसी भी (अररुषः मर्त्यस्य) = रोषकारी मनुष्य की (धूर्त्तिः) = हिंसा-चेष्टा (नः मा प्र णङ्) = हम तक न पहुँचे।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- राजा कठोर नियमों द्वारा शासन व्यवस्था को सुदृढ़ रखे। कोई भी उग्रवादी, आतंकवादी या शत्रु सैनिक प्रजा जनों पर हिंसा चेष्टा न कर सके।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्राग्नी) हे पूर्वोक्ता विद्वांसः ! (कस्य) कस्यचिदपि (अररुषः, मर्त्यस्य) दुष्टमनुजस्य (धूर्तिः) अनिष्टैषिणं (नः) मां (मा, प्रणक्) मा विदधतु (शर्म) सुखं च (यच्छतम्) ददतु ॥८॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Let no violent man’s evil design ever touch and injure us. Indra and Agni, pray give us the peace and felicity of a happy home.