ता हि शश्व॑न्त॒ ईळ॑त इ॒त्था विप्रा॑स ऊ॒तये॑ । स॒बाधो॒ वाज॑सातये ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
tā hi śaśvanta īḻata itthā viprāsa ūtaye | sabādho vājasātaye ||
पद पाठ
ता । हि । शश्व॑न्तः । ईळ॑ते । इ॒त्था । विप्रा॑सः । ऊ॒तये॑ । स॒ऽबाधः॑ । वाज॑ऽसातये ॥ ७.९४.५
ऋग्वेद » मण्डल:7» सूक्त:94» मन्त्र:5
| अष्टक:5» अध्याय:6» वर्ग:17» मन्त्र:5
| मण्डल:7» अनुवाक:6» मन्त्र:5
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (सबाधः) पीड़ित हुए (वाजसातये) यज्ञों में (विप्रासः) मेधावी लोग (ऊतये) अपनी रक्षा के लिए (इत्था) इस प्रकार (शश्वन्तः) निरन्तर (ता, हि) निश्चय करके उक्त कर्मयोगी, ज्ञानयोगी की (ईळते) स्तुति करते हैं ॥५॥
भावार्थभाषाः - जो लोग इस भाव से यज्ञ करते हैं कि उनकी बाधायें निवृत्त होवें, वे अपने यज्ञों में कर्मयोगी, ज्ञानयोगी विद्वानों को अवश्यमेव बुलायें, ताकि उनके सत्सङ्ग द्वारा ज्ञान और कर्म से सम्पन्न होकर सब बाधाओं को दूर कर सकें ॥५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
विद्वान् का कर्त्तव्य
पदार्थान्वयभाषाः - पदार्थ - (इत्था) = इस प्रकार (शश्वन्तः विप्रास:) = बहुत से विद्वान् पुरुष (सबाध:) = पीड़ित होकर दुःख पीड़ा आदि की चर्चा संदेशादि लेकर (उतये) = अपनी रक्षा और (वाजसातये) = संग्राम करने के लिये (ता हि ईडते) = उन दोनों इन्द्र, अग्नि को अध्यक्ष रूप से चाहते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- विद्वानों व प्रजा जनों को जब भी कोई पीड़ा या शत्रु सेना के आक्रमण की सूचना होवे तो उसके निवारण हेतु राजा व सेनानायक के पास जाकर विद्वान् लोग अपना सन्देश देवें ।
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (विप्रासः) मेधाविनः (ऊतये) स्वरक्षायै (इत्था) इत्थं (शश्वन्तः) सदैव (ता हि) निश्चयेन (सबाधः, वाजसातये) विघ्नबाधिता स्वबलाय सुखाय च (ईळते) ज्ञानयोगिनं कर्मयोगिनं च स्तुवन्ति ॥५॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Beset with difficulties, saints and sages, scholars and pioneers always look up to them and thus pray for protection and guidance to move further and win their goal.
