माता-पिता के समान प्रजापालक राजा
पदार्थान्वयभाषाः - पदार्थ - जैसे (वृत्र-हणा) = विघ्ननाशन करनेवाले माता-पिता (नव-जातं शुचिं) = नये उत्पन्न उत्तम शुद्ध बालक को (जुषेताम्) = प्रेम करते और (धेष्ठा वाजं उशते दत्तः) = पालक माता-पिता बुभुक्षित को अन्न देते हैं वैसे ही हे (इन्द्राग्नी) = ऐश्वर्यवन् और तेजस्विन् अग्रणी नायको! आप दोनों (वृत्र-हणा) = बढ़ते शत्रुओं के नाशक होकर (शुचिम्) = पवित्र व्यवहारवाले (नवजातम्) = नये ही प्राप्त, (स्तोमं) = स्तुतियोग्य प्रजा के अधिकार (अद्य) = आज के समान सदा (जुषेताम्) = प्रेम और उत्साह से प्राप्त करें। (ता) = वे दोनों (धेष्ठा) = प्रजा, सैन्य, सभादि के अधिकार को उत्तम रीति से धारण करने में समर्थ होकर (सद्यः) = शीघ्र ही (उशते) = कामनावाले प्रजाजन को (वाजं) = अभिलषित धन, अन्न, बल, ज्ञान आदि दें। (उभाहि वां) = आप दोनों को ही मैं (सु हवा) = सुख से, आदर सहित बुलाने योग्य (जोहवीमि) = स्वीकार करता हूँ, आपको आदर से निमन्त्रित करूँ। माता-पिता दोनों ही इन्द्र और दोनों ही अग्नि हैं। वे सन्तान के बाधक कारणों का नाश करने से 'वृत्रहन्' हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- राष्ट्रनायक तथा सेनानायक दोनों तेजस्वी होकर प्रजा को ऐश्वर्य सम्पन्न बनाकर रक्षा करें। प्रजा के साथ प्रेमपूर्वक मधुर व्यवहार करें। उन्हें सुखी बनाने के लिए इच्छित धन, अन्न, बल व ज्ञान प्रदान करावें। और प्रजा का उत्तम रीति से पुत्रवत् पालन करें।