वांछित मन्त्र चुनें

ध्रु॒वासु॑ त्वा॒सु क्षि॒तिषु॑ क्षि॒यन्तो॒ व्य१॒॑स्मत्पाशं॒ वरु॑णो मुमोचत् । अवो॑ वन्वा॒ना अदि॑तेरु॒पस्था॑द्यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभि॒: सदा॑ नः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

dhruvāsu tvāsu kṣitiṣu kṣiyanto vy asmat pāśaṁ varuṇo mumocat | avo vanvānā aditer upasthād yūyam pāta svastibhiḥ sadā naḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ध्रु॒वासु॑ । त्वा॒ । आ॒सु । क्षि॒तिषु॑ । क्षि॒यन्तः॑ । वि । अ॒स्मत् । पाश॑म् । वरु॑णः । मु॒मो॒च॒त् । अवः॑ । व॒न्वा॒नाः । अदि॑तेः । उ॒पऽस्था॑त् । यू॒यम् । पा॒त॒ । स्व॒स्तिऽभिः॑ । सदा॑ । नः॒ ॥ ७.८८.७

ऋग्वेद » मण्डल:7» सूक्त:88» मन्त्र:7 | अष्टक:5» अध्याय:6» वर्ग:10» मन्त्र:7 | मण्डल:7» अनुवाक:5» मन्त्र:7


0 बार पढ़ा गया

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ध्रुवासु, त्वासु, क्षितिषु) इस दृढ़ और नित्य पृथिवी में (क्षियन्तः) निवास करते हुए (अस्मत्पाशं) हम लोगों के बन्धनों को (वरुण) हे सर्वपूज्य परमात्मा ! (वि) अवश्य (मुमोचत्) मुक्त करें, (अदितेः) इस अखण्डनीय मातृभूमि के (उपस्थात्) अङ्क में रहते हुए हम लोगों की (अवः) आप रक्षा करें और विद्वान् लोगों से हम सदैव (वन्वानाः) भजन करते हुए यह प्रार्थना करें कि (यूयं) आप लोग सदा सदैव (स्वस्तिभिः) कल्याणप्रद वाणियों से (नः) हमारी (पात) रक्षा करें ॥७॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में जो पृथिवी को नित्य कथन किया है, इससे यह तात्पर्य्य है कि यह संसार मिथ्या नहीं, क्योंकि ध्रुव पदार्थ मिथ्या नहीं होता, किन्तु दृढ़ होता है ॥७॥ यह ८८वाँ सूक्त और १०वाँ वर्ग समाप्त हुआ।
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

परमेश्वर जीवों के कर्म बन्धन काटता है

पदार्थान्वयभाषाः - पदार्थ- परमेश्वर जीवों के कर्म-बन्धन किस प्रकार काटता है? हम लोग (आसु ध्रुवासु क्षितिषु) = इन धारने योग्य, कर्म और भोग-भूमियों में (क्षियन्तः) = निवास करते हुए वा ऐश्वर्ययुक्त, वा क्षीण होते हुए, कभी ऊर्ध्वगति, कभी नीच गति प्राप्त करते हुए, (अदितेः उपस्थात्) = भूमि से (अव: वन्वाना:) = तृप्तिकारक अन्न प्राप्त करते हैं और जैसे (अदितेः उपस्थात् अवः अन्वानाः) = सूर्य से दीप्ति प्राप्त करते हैं वैसे ही (अदितेः) = अखण्ड परमेश्वर से हम (अव:) = रक्षा सुख, प्रेम (वन्वाना:) = प्राप्त करते रहें। वह (वरुणः) = प्रभु (अस्मत् पाशं) = हम से पाश को (वि मुमोचत्) = छुड़ाता है। हे विद्वान् पुरुषो! (नः यूयं सदा स्वस्तिभिः पात) = आप लोग हमारी सदा उत्तम उपायों से रक्षा करो।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-जीव कर्म के अनुसार भोग व भूमियों को भोगता हुआ ऊँची व नीची योनियों में जाता है। । दुःख और सुख को भोगता है। किन्तु जब वह परमेश्वर की रक्षा व प्रेम का अनुभव करने लगता है तो ईश्वर उसको कर्म पाश-बन्धन से मुक्त कर देता है। आगामी सूक्त का ऋषि वसिष्ठ व देवता वरुण है।
0 बार पढ़ा गया

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ध्रुवासु, त्वासु, क्षितिषु) अस्यां नित्यायां दृढायां च पृथिव्यां (क्षियन्तः) निवसतां (वन्वानाः) भजमानानां (अस्मत्पाशम्) अस्माकं पाशं (वरुण) हे भगवन् ! (वि) निश्चयं (मुमोचत्) मुञ्च (अदितेः) अस्मिन्नखण्डमातृभूमिस्थले (उपस्थात्) निवसतामस्माकं (अवः) रक्षां कुरु तथा च (यूयम्) भवान् (स्वस्तिभिः) कल्याणवाग्भिः (सदा) शश्वत् (नः) अस्मान् (पात) रक्षतु ॥७॥ इत्यष्टाशीतितमं सूक्तं दशमो वर्गश्च समाप्तः ॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Living in these settled homes in these peaceful lands of mother earth, we pray, may Varuna release us from the bonds of sin and sinful existence. Enjoying peace and protection received from the lap of inviolable earth and mother Infinity, O saints and sages, protect and promote us with all modes of peace and well being always without relent.