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स सु॒क्रतु॑ॠत॒चिद॑स्तु॒ होता॒ य आ॑दित्य॒ शव॑सा वां॒ नम॑स्वान् । आ॒व॒वर्त॒दव॑से वां ह॒विष्मा॒नस॒दित्स सु॑वि॒ताय॒ प्रय॑स्वान् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

sa sukratur ṛtacid astu hotā ya āditya śavasā vāṁ namasvān | āvavartad avase vāṁ haviṣmān asad it sa suvitāya prayasvān ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सः । सु॒ऽक्रतुः॑ । ऋ॒त॒ऽचित् । अ॒स्तु॒ । होता॑ । यः । आ॒दि॒त्या॒ । शव॑सा । वा॒म् । नम॑स्वान् । आ॒ऽव॒वर्त॑त् । अव॑से । वा॒म् । ह॒विष्मा॑न् । अस॑त् । इत् । सः । सु॒वि॒ताय॑ । प्रय॑स्वान् ॥ ७.८५.४

ऋग्वेद » मण्डल:7» सूक्त:85» मन्त्र:4 | अष्टक:5» अध्याय:6» वर्ग:7» मन्त्र:4 | मण्डल:7» अनुवाक:5» मन्त्र:4


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सः) वह पुरुष (सुक्रतुः) उत्तम कर्मों के करनेवाला (ऋतचित्) वही सत्यवादी (होता) वही यज्ञ करनेवाला (अस्तु) है, (यः) जो (आदित्या) आदित्य के समान तेजस्वी होकर (शवसा) अपने सामर्थ्य से (वां) इन्द्र तथा वरुण की शक्ति को (नमस्वान्) सबसे बड़ी समझता और जो (वां) इन्द्र तथा वरुण की शक्ति को (अवसे) रक्षा के लिए (आववर्तत्) वर्ताव में लाता है और जो (हविष्मान्) सदैव यज्ञादि कर्म करता है, (सः) वह (इत्) निश्चय करके (प्रयस्वान्) ऐश्वर्य्ययुक्त होकर (सुविताय) संसार में यशस्वी (असत्) होता है ॥४॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे मनुष्यों ! तुम इन्द्र=विद्युत् तथा वरुण=वायुरूप शक्ति को काम में लाओ। जो इन शक्तियों को व्यवहार में लाता है, वह ऐश्वर्य्यसम्पन्न होकर सम्पूर्ण संसार में फैलता अर्थात् उसकी अतुल कीर्ति होती है और वही पुरुष तेजस्वी बनकर अमित्र सेना का हनन करनेवाला होता है ॥४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

समृद्ध राष्ट्र का निर्माण

पदार्थान्वयभाषाः - पदार्थ- हे (आदित्या:) = अखण्ड राजनीति और भूमि के (हितैषी) = जनो ! (यः) = जो (होता) = दानशील पुरुष (शवसा) = स्व बल से तुम दोनों के प्रति (नमस्वान्) = अन्नादि सत्कार से युक्त होता है (सः) = वह (सु-क्रतुः) = शुभ-कर्मकारी और (ऋतचित् अस्तु) = सत्य ज्ञान का उपार्जक हो और जो (अवसे) = रक्षा के लिये (वां आववर्त्तत्) = तुम दोनों को प्राप्त होता है, वह (प्रयस्वान्) = प्रयत्नशील होकर (सुविताय इत् आत्) = सुख प्राप्त करने में समर्थ, (हविष्मान्) = अन्नसम्पन्न हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- राष्ट्र भक्त धनी जन राष्ट्र के लिए कर के रूप में धन का दान करें तथा राष्ट्र के पालन एवं समृद्धि में सहयोगी बनें। वीर पुरुष राष्ट्र रक्षा के लिए सेना में भर्ती होकर मातृभूमि की सेवा करे। कर्मचारी लोग परिश्रम और पुरुषार्थ से कृषि एवं उद्योग को बढ़ावें ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सः) स पुरुषः (सुक्रतुः) शुभकर्मकर्त्ता (ऋतचित्) तथा सत्यवादी (होता) च पुनः स एव यज्ञकर्ता (अस्तु) अस्तु=स्यात् (यः) यः पुरुषः (आदित्या) आदित्य इव तेजस्वी भूत्वा (शवसा) स्वसामर्थ्येन (वाम्) इन्द्रावरुणौ (नमस्वान्) लोकोत्तरतेजस्कौ नमस्करणीयौ मन्यते, तथा यः (वाम्) तावेव (अवसे) रक्षायै (आववर्तत्) आवर्तयेत् (हविष्मान्) यश्च हविर्भिर्युक्तो भवति (सः) स पुरुषः (इत्) निश्चयम् (प्रयस्वान्) ऐश्वर्यसम्पन्नो भूत्वा (सुविताय) शोभनफलप्राप्त्यै (असत्) भवतु ॥४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Surely that individual is a good citizen of noble action, a true yajaka, dedicated to universal values of truth and law, who, of his own free will, with his power and potential and high degree of endeavour and application, turns to you, O brilliant Indra and Varuna, with sincere loyalty and homage for the sake of protection and advancement. And surely he deserves all round happiness and well being.