पदार्थान्वयभाषाः - पदार्थ- (परियत्ताय) = सब ओर से नियन्त्रित, (दाश-राज्ञे) = दशों राजाओं के बीच प्रबल, (सुदासे) = उत्तम दानशील राजा को हे (इन्द्रावरुणा) = ऐश्वर्यवन्! हे शत्रुवारणकारी मनुष्य वर्गों! (अशिक्षतम्) = आप दोनों ज्ञान, बल दो (यत्र) = जिसके अधीन (श्वित्यञ्चः) = उज्ज्वल यश, या समृद्धि को प्राप्त (कपर्दिनः) = उत्तम जटाजूट वा उत्तम धन-सम्पन्न और (धीवन्तः) = बुद्धिमान्, (तृत्सवः) = शत्रुनाशक, त्रिविध ऐश्वर्यों के स्वामी लोग (नमसा) = आदर पूर्वक अन्न, वज्र, शस्त्रादि-सहित (असपन्त) = समूह बनाकर रहते हैं। [कपर्दिन:- कपर्द:- जटाजूट: अथवा कपर्दः धनम्। कौड़ी इत्युपलक्षणम्। तद्वन्तः] पैसेवाले। अध्यात्म में- दश प्राण, दश इन्द्रियें दश राजा हैं, वे दस स्थानों पर पृथक्-पृथक् विद्यमान हैं। परस्पर उनका कोई सीधा सम्बन्ध न होने से 'अयज्यु' हैं। वे एक ही साथ हमें प्राप्त (सम्-इता:) = हैं। आत्मा 'सुदास' है, प्राण अपान इन्द्र-वरुण हैं। सुखप्रद ज्ञानतन्तु 'तृत्सु' हैं वे सुखपूर्वक होने से 'कपर्दी' हैं। वे 'नमसा, धिया' अन्न और बुद्धि के बल से आत्मा के अधीन हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रजाहितैषी राजा पर यदि दस शत्रु राजा भी एक साथ मिलकर आक्रमण करें तो भी वह नहीं हार सकता। क्योंकि सेना, प्रजा तथा गुप्तचर मिलकर उन शत्रुओं की शक्ति को ध्वस्त कर देंगे।