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दश॒ राजा॑न॒: समि॑ता॒ अय॑ज्यवः सु॒दास॑मिन्द्रावरुणा॒ न यु॑युधुः । स॒त्या नृ॒णाम॑द्म॒सदा॒मुप॑स्तुतिर्दे॒वा ए॑षामभवन्दे॒वहू॑तिषु ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

daśa rājānaḥ samitā ayajyavaḥ sudāsam indrāvaruṇā na yuyudhuḥ | satyā nṛṇām admasadām upastutir devā eṣām abhavan devahūtiṣu ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

दश॑ । राजा॑नः । सम्ऽइ॑ताः । अय॑ज्यवः । सु॒ऽदास॑म् । इ॒न्द्रा॒व॒रु॒णा॒ । न । यु॒यु॒धुः॒ । स॒त्या । नृ॒णाम् । अ॒द्म॒ऽसदा॑म् । उप॑ऽस्तुतिः । दे॒वाः । ए॒षा॒म् । अ॒भ॒व॒न् । दे॒वऽहू॑तिषु ॥ ७.८३.७

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ऋग्वेद » मण्डल:7» सूक्त:83» मन्त्र:7 | अष्टक:5» अध्याय:6» वर्ग:5» मन्त्र:2 | मण्डल:7» अनुवाक:5» मन्त्र:7


आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अयज्यवः) अवैदिक (दश, राजानः) दश राजा (समिताः) इकठ्ठे होकर (सुदासं) वेदानुयायी राजा से (न, युयुधुः) युद्ध नहीं कर सकते (देवहूतिषु) युद्धों में (अद्मसदां, देवाः) यज्ञशील विद्वान् पुरुष (एषां) इन (नृणां) वेदानुयायी पुरुषों की (सत्या) सत्यरूप से (उपस्तुतिः) स्तुति (अभवन्) करते हैं, (इन्द्रावरुणा) हे विद्यासम्पन्न राजपुरुषो ! तुम ऐसे साधनसम्पन्न पुरुषों की सहायता करो ॥७॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में यह उपदेश किया है कि राजा तथा राजकीय पुरुषों को सदा वैदिक धर्म का अनुष्ठान करना चाहिए, क्योंकि व्रत, तप तथा अनुष्ठानशील राजा को दश राजा भी मिलकर युद्ध में पराजित नहीं कर सकते, दृढ़व्रती, कर्मकाण्डी तथा धीर-वीर राजा की सब विद्वान् प्रशंसा करते और वही अपने सब कार्यों को विधिवत् करता हुआ संसार में कृतकार्य्य होता है, ऐसे धर्मज्ञ राजा की सब विद्वानों को सहायता करनी चाहिए ॥७॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

नीति कुशल राजा

पदार्थान्वयभाषाः - पदार्थ- (अयज्यवः) = देवपूजा और संगति न करनेवाले (दश राजानः) = दस तेजस्वी पुरुष भी (सम् इता:) = एक साथ आकर (सुदासम् न युयुधुः) = उत्तम दानशील तथा शत्रु नाश में कुशल राजा से नहीं लड़ सकते। (अद्मसदाम्) = समान अन्न पर स्थित (नृणाम्) = मनुष्यों की (उपस्तुतिं) = समीप समीप बैठकर की गई प्रार्थना भी (सत्या) = फलजनक होती है। (एषाम्) = इनके (देवहूतिषु) = विद्वान् वीरों को आह्वानों, यज्ञों, संग्रामों के अवसरों पर (देवा:) = वीर पुरुष (अभवन्) = सहायक होते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- युद्धनीति व राजनीति में कुशल राजा के साथ दस महारथी भी एक साथ युद्ध करें तो भी नहीं हरा सकते क्योंकि इस राजा के सहायक वीर वहीं कहीं आस-पास ही होते हैं जो संकेत पाते ही शत्रु पर टूट पड़ेंगे।

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अयज्यवः) अवैदिकाः (दश, राजानः) दशसङ्ख्याका राजानः (समिताः) सम्मिलिताः सन्तः (सुदासम्) वेदानुयायिनैकेन राज्ञा (न, युयुधुः) युद्धं न कर्तुं शक्नुवन्ति (देवहूतिषु) युद्धेषु (अद्मसदाम्, देवाः) याजका विद्वांसः (एषाम्) एषां वेदानुयायिनां (नृणाम्) मनुष्याणां (सत्या) सत्यतया (उपस्तुतिः) उपस्तुतिं (अभवन्) कुर्वन्ति (इन्द्रावरुणा) भो विद्याभिरलङ्कृता राजपुरुषाः ! यूयमीदृक् साधनसम्पन्नपुरुषाणां सहाया भवत ॥७॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra and Varuna, spirit of life and sense of judgement victorious over evil and impiety, even ten brilliant but impious and impulsive forces together cannot fight against the versatile and generous ruler of the self and society. The prayers of holy men dedicated to divinity in the house of yajna and charity come true and the divinities of humanity and nature both join the invocations of these holy men in their acts of piety and divine service.