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यु॒वां ह॑वन्त उ॒भया॑स आ॒जिष्विन्द्रं॑ च॒ वस्वो॒ वरु॑णं च सा॒तये॑ । यत्र॒ राज॑भिर्द॒शभि॒र्निबा॑धितं॒ प्र सु॒दास॒माव॑तं॒ तृत्सु॑भिः स॒ह ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yuvāṁ havanta ubhayāsa ājiṣv indraṁ ca vasvo varuṇaṁ ca sātaye | yatra rājabhir daśabhir nibādhitam pra sudāsam āvataṁ tṛtsubhiḥ saha ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यु॒वाम् । ह॒व॒न्ते॒ । उ॒भया॑सः । आ॒जिषु॑ । इन्द्र॑म् । च॒ । वस्वः॑ । वरु॑णम् । च॒ । सा॒तये॑ । यत्र॑ । राज॑ऽभिः । द॒शऽभिः॑ । निऽबा॑धितम् । प्र । सु॒ऽदास॑म् । आव॑तम् । तृत्सु॑ऽभिः । स॒ह ॥ ७.८३.६

ऋग्वेद » मण्डल:7» सूक्त:83» मन्त्र:6 | अष्टक:5» अध्याय:6» वर्ग:5» मन्त्र:1 | मण्डल:7» अनुवाक:5» मन्त्र:6


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - हे इन्द्र तथा वरुणरूप योद्धाओं ! (युवां) आपको हम लोग (उभयासः, आजिषु) दोनों प्रकार के युद्धों में (हवन्ते) बुलाते हैं (इन्द्रं, च, वस्वः) इन्द्र को धन के लिए (च) और (वरुणं, सातये) वरुण को विजयप्राप्ति के लिए (यत्र) जिस युद्ध में (दशभिः, राजभिः) दश प्रकार के राजाओं से (निबाधितं) पीड़ा को प्राप्त (तृत्सुभिः, सह) तीनों प्रकार के ज्ञानियों के साथ (सुदासं) योग्य राजा को (आवतं) प्राप्त होओ ॥६॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे इन्द्र तथा वरुणरूप विद्वानों ! तुम युद्धों में विजयप्राप्त करते हुए कर्मानुष्ठानी तथा वेदविद्याप्रकाशक विद्वानों की रक्षा करो अर्थात् कर्म, उपासना तथा ज्ञान द्वारा भक्तिभाव को प्राप्त पुरुषों की सेवा में सदा तत्पर रहो, जिससे उन्हें कोई कष्ट प्राप्त न हों ॥६॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रजाहित

पदार्थान्वयभाषाः - पदार्थ- (यत्र) = जिन संग्रामों में (दशभिः राजभिः) = दसों राजाओं वा तेजस्वी पुरुषों से (नि बाधितम्) = अति पीड़ित (सुदासं) = उत्तम दानशील पुरुष की (तृत्सु)भिः = शत्रु को काटनेवाले वीर भटों से (प्र अवतम्) = रक्षा करते हो, उन (आजिषु) = युद्धों में (इन्द्रं च) = ऐश्वर्यवान् और (वरुणं च) = श्रेष्ठ (युवां) = आप दोनों को (वस्वः सातये) = धनैश्वर्यादि के लाभ के लिये (उभयासः) = वादी प्रतिवादी दोनों पक्ष के लोग (हवन्ते) = पुकारते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-संग्रामों में पीड़ित जनों को हुए नुकसान की भरपाई के लिए राजा को योग्य है वह प्रजा के मध्य में जाकर दिग्दर्शन करे तथा प्रजाजनों को उचित सहयोग व सहायता करे।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - भो इन्द्रवरुणस्वरूपा योद्धारः ! (युवाम्) युष्मान् वयम् (उभयासः, आजिषु) उभयविधेषु युद्धेषु (हवन्ते) आह्वयामः (इन्द्रम्, च, वस्वः) इन्द्रं धनाय (च) तथा (वरुणम्, सातये) वरुणं च विजयप्राप्त्यै (यत्र) यस्मिन्युद्धे (दशभिः, राजभिः) दशसङ्ख्याकै राजभिः (निबाधितम्) आक्रान्तं (तृत्सुभिः, सह) त्रिविधैर्ज्ञानिभिः सह (सुदासम्) सुनृपं (आवतम्) प्राप्नुत–रक्षत ॥६॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Both the people and the leaders call upon you in battles, O Indra and Varuna, for victory in battle and regaining of success and prosperity. They call upon you in battle where you defend the generous ruler against tens of tormenting dictators and, alongwith the ruler, you save three orders of scholars and sages in three fields of arts, sciences and universal values of Dharma and justice.