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अ॒र्वाङ्न॑रा॒ दैव्ये॒नाव॒सा ग॑तं शृणु॒तं हवं॒ यदि॑ मे॒ जुजो॑षथः । यु॒वोर्हि स॒ख्यमु॒त वा॒ यदाप्यं॑ मार्डी॒कमि॑न्द्रावरुणा॒ नि य॑च्छतम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

arvāṅ narā daivyenāvasā gataṁ śṛṇutaṁ havaṁ yadi me jujoṣathaḥ | yuvor hi sakhyam uta vā yad āpyam mārḍīkam indrāvaruṇā ni yacchatam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒र्वाक् । न॒रा॒ । दैव्ये॑न । अव॑सा । आ । ग॒त॒म् । शृ॒णु॒तम् । हव॑म् । यदि॑ । मे॒ । जुजो॑षथः । यु॒वोः । हि । स॒ख्यम् । उ॒त । वा॒ । यत् । आप्य॑म् । मा॒र्डी॒कम् । इ॒न्द्रा॒व॒रु॒णा॒ । नि । य॒च्छ॒त॒म् ॥ ७.८२.८

ऋग्वेद » मण्डल:7» सूक्त:82» मन्त्र:8 | अष्टक:5» अध्याय:6» वर्ग:3» मन्त्र:3 | मण्डल:7» अनुवाक:5» मन्त्र:8


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (नरा) हे मनुष्यों ! तुम (अर्वाक्) मेरे सम्मुख आओ (उत) और (दैव्येन, अवसा) दिव्य रक्षा से (आगतं) आये हुए तुमको (हवं) उपदेश करता हूँ, जिसको (शृणुतं) ध्यानपूर्वक सुनो। (इन्द्रावरुणा) हे विद्वानों ! (यत्) जो आप (यदि) यदि (नियच्छतम्) निष्कपट भाव से मनोदान देकर (मे) मेरे में (जुजोषथः) जुड़ोगे=प्रीति करोगे, तो मैं (हि) निश्चय करके (युवोः, सख्यं) तुम्हारी मैत्री का पालन करूँगा (वा) अथवा (आप्यं) तुम्हें प्राप्त होने योग्य (मार्डीकं) सुख दूँगा ॥८॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा उपदेश करते हैं कि आग्नेयास्त्र तथा वारुणास्त्र आदि अस्त्र-शस्त्रों की विद्या में निपुण विद्वानों ! तुम सरलभाव से मेरे में प्रीति करो अर्थात् शुद्ध हृदय से वेदाज्ञा का पालन करते हुए मेरे सम्मुख आओ, मैं तुम्हें सुखसम्पन्न करूँगा ॥८॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

इन्द्र-वरुण प्रजा के वचन

पदार्थान्वयभाषाः - पदार्थ- हे (इन्द्रा-वरुणा) = ऐश्वर्यवन् ! हे शत्रुवारक ! (नरा) = नायको ! (यदि) = यदि आप दोनों मे (जुजोषथः) = मुझसे प्रेम करते हो तो (मे हवं शृणुतम्) = मेरा वचन सुनो और (दैव्येन) = विद्वान्, वीर पुरुषों से बने (अवसा) = रक्षा आदि साधन सहित (अर्वाङ् आगतम्) = हमारे पास आओ। (युवोः) = आप दोनों की (हि) = निश्चय से (यत्) = जो (सख्यम्) = मित्रता और (मार्डीकम् आप्यम्) = सुखकारी बन्धुता है, उसे हमें (नि यच्छतम्) = दो।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- राष्ट्र में राजा और सेनापति मित्रवत् रहें इससे प्रजा का मनोबल बढ़ता है। ये दोनों प्रजाओं के मध्य में जाकर उनकी समस्याओं को सुना करें तथा उनका यथोचित समाधान किया करें।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (नरा) भो जनाः ! यूयं (अर्वाक्) मम समक्षमागच्छत (उत्) तथा (दैव्येन, अवसा) दिव्यत्राणेन (आगतम्) आयातान्युष्मान् (हवम्) उपदिशामि, तत् (शृणुतम्) अवधानपराः शृणुत, (इन्द्रावरुणा) हे विद्वांसः ! (यत्) यत् यूयं (यदि) चेत् (नियच्छतम्) निष्कपटाः सन्तो मनो निधाय (मे) मयि (जुजोषथः) योक्ष्यध्वे प्रेमपरा भविष्यथ, तर्हि अहं (हि) निश्चयेन (युवोः सख्यम्) युष्मन्मैत्रीमभिरक्षिष्यामि (वा) यद्वा (आप्यम्) युष्मभ्यं युष्मत्प्रापणीयं (मार्डीकम्) सुखं दास्यामि ॥८॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O Indra and Varuna, leading lights of nature and humanity, lords of power, justice and mercy of the social and natural order, since I enjoy your love and friendship, come hither to me with protection and promotion, listen to my call, and bear, bring and give me the benefit of your friendship and whatever is peaceful, blissful and attainable.