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म॒हे शु॒ल्काय॒ वरु॑णस्य॒ नु त्वि॒ष ओजो॑ मिमाते ध्रु॒वम॑स्य॒ यत्स्वम् । अजा॑मिम॒न्यः श्न॒थय॑न्त॒माति॑रद्द॒भ्रेभि॑र॒न्यः प्र वृ॑णोति॒ भूय॑सः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

mahe śulkāya varuṇasya nu tviṣa ojo mimāte dhruvam asya yat svam | ajāmim anyaḥ śnathayantam ātirad dabhrebhir anyaḥ pra vṛṇoti bhūyasaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

म॒हे । शु॒ल्काय॑ । वरु॑णस्य । नु । त्वि॒षे॑ । ओजः॑ । मि॒मा॒ते॒ इति॑ । ध्रु॒वम् । अ॒स्य॒ । यत् । स्वम् । अजा॑मिम् । अ॒न्यः । श्न॒थय॑न्तम् । आ । अति॑रत् । द॒भ्रेभिः॑ । अ॒न्यः । प्र । वृ॒णो॒ति॒ । भूय॑सः ॥ ७.८२.६

ऋग्वेद » मण्डल:7» सूक्त:82» मन्त्र:6 | अष्टक:5» अध्याय:6» वर्ग:3» मन्त्र:1 | मण्डल:7» अनुवाक:5» मन्त्र:6


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वरुणस्य) वारुणास्त्र का प्रयोग करनेवाला पुरुष (नु) निश्चय करके (महे, शुल्काय) बड़े ऐश्वर्य्य के लिए (त्विषे, ओजः) अपने तेज तथा बल द्वारा (मिमाते) शीघ्र ही शत्रु का (अतिरत्) हनन करता, (अस्य) उनका (यत्) जो (ध्रुवं) निश्चल (स्वं) धन है, वह (अजामिम्) शत्रु को (श्नथयन्त) नाश कर देता और (अन्यः) अन्य जो बल है, वह (अतिरत्) हनन करता है, वह (अन्यः) अन्य (दभ्रेभिः) अल्प साधनों से ही (भूयसः) बहुत से शत्रुओं को (प्र, वृणोति) भले प्रकार अपने वश में कर लेता है ॥६॥
भावार्थभाषाः - वारुणास्त्र का प्रयोग करनेवाला विद्वान् अल्प साधनों से ही शत्रुसेना का विजय करके उसकी सामग्री पर अपना अधिकार जमा लेता है। उसका शस्त्र-अस्त्ररूप धन शत्रुओं के नाश का कारण होता है अर्थात् उसके इस अपूर्व धन के सम्मुख कोई शत्रु नहीं ठहर सकता, वह अनेक शत्रुओं को विजय करके बड़ा ऐश्वर्य्यसम्पन्न होता है ॥६॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

इन्द्र-वरुण का पराक्रम

पदार्थान्वयभाषाः - पदार्थ - (अस्य वरुणस्य) = इस 'वरुण' की (यत्) = जो (ध्रुवम् स्वम्) = स्थिर सम्पदा है उस (महे शुल्काय) = बड़े ऐश्वर्य और (त्विषे) = तेजोवृद्धि के लिये (नु) = 'इन्द्र और वरुण' दोनों ही (ओजः) = पराक्रम करते हैं। कैसे करते हैं कि- (अन्तः) = एक तो (श्नथयन्तम् अजामिम्) = हिंसा करनेवाले शत्रु को (आ अतिरत्) = सब ओर से नष्ट करता है और (अन्य:) = दूसरा (दभ्रेभिः) = हिंसाकारी शस्त्रास्त्रों से (भूयसः प्र वृणोति) = बहुत शत्रुओं को आच्छादित करता और उनको दूर से ही वारण करता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- राष्ट्र के स्थिर ऐश्वर्य की वृद्धि के लिए राजा और सेनापति दोनों मिलकर पराक्रम करें। राजा शासन व्यवस्था के द्वारा राष्ट्र के आन्तरिक शत्रुओं को नष्ट करे और सेनापति शस्त्रास्त्रों के द्वारा बाहरी शत्रुओं से राष्ट्र की रक्षा करे।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वरुणस्य) वारुणास्त्रस्य प्रयोक्ता (नु) निश्चयं (महे, शुल्काय) महत ऐश्वर्याय (त्विषे, ओजः) स्वेन तेजसा बलेन च (मिमाते) शत्रूञ्जयति (अतिरत्) अभिहन्ति (अस्य) अस्य शत्रोः (यत्) यत् किञ्चित् (ध्रुवम्) स्थिरं (स्वम्) धनमस्ति तत् (अजामिम्) अबन्धुं=स्वीयं करोति (श्नथयन्तम्) स्वप्रतिपक्षिणं च जय (अन्यः) अन्यद्बलं च हन्ति (अन्यः) अन्यैः (दभ्रेभिः) अल्पैरेव साधनैः (भूयसः) बहून् शत्रून् (प्र, वृणोति) स्ववशमानयति ॥६॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - For the greatness and rising prosperity of the social order of peace and progress, Indra and Varuna augment its power and lustre and preserve and increase what its basic and consolidated national asset is. One of them, Indra, overthrows its unfriendly and hostile opponents who try to sabotage and arrest its progress, and the other, Varuna, even with minimum but convincing power, subdues many devastating critics.