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ताव॑दुषो॒ राधो॑ अ॒स्मभ्यं॑ रास्व॒ याव॑त्स्तो॒तृभ्यो॒ अर॑दो गृणा॒ना । यां त्वा॑ ज॒ज्ञुर्वृ॑ष॒भस्या॒ रवे॑ण॒ वि दृ॒ळ्हस्य॒ दुरो॒ अद्रे॑रौर्णोः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tāvad uṣo rādho asmabhyaṁ rāsva yāvat stotṛbhyo arado gṛṇānā | yāṁ tvā jajñur vṛṣabhasyā raveṇa vi dṛḻhasya duro adrer aurṇoḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ताव॑त् । उषः॑ । राधः॑ । अ॒स्मभ्य॑म् । रा॒स्व॒ । याव॑त् । स्तो॒तृऽभ्यः॑ । अर॑दः । गृ॒णा॒ना । याम् । त्वा॒ । ज॒ज्ञुः । वृ॒ष॒भस्य॑ । रवे॑ण । वि । दृ॒ळ्हस्य॑ । दुरः॑ । अद्रेः॑ । औ॒र्णोः॒ ॥ ७.७९.४

ऋग्वेद » मण्डल:7» सूक्त:79» मन्त्र:4 | अष्टक:5» अध्याय:5» वर्ग:26» मन्त्र:4 | मण्डल:7» अनुवाक:5» मन्त्र:4


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (उषः) हे ज्ञानस्वरूप परमात्मन् ! (अस्मभ्यं) हमलोगों को (अरदः) प्रथम (तावत् राधः रास्व) उतना धन प्रदान करें, (यावत्) जितने से हम (गृणाना) आपको ग्रहण करनेवाले (स्तोतृभ्यः) स्तोता विद्वानों को प्रसन्न कर सकें, (यां त्वा) जो आपको (वृषभस्य रवेण जज्ञुः) वृषभ के समान उच्चस्वर से प्रकट कर रहे हैं अर्थात् आपकी स्तुति करते हैं और हमारे लिये (दृळ्हस्य दुरः अद्रेः) दृढ़तायुक्त कठिन से कठिन मार्गों को (वि) भली-भाँति (और्णोः) खोल दें ॥४॥
भावार्थभाषाः - हे सर्वपालक भगवन् ! आप हमको ऐश्वर्य्यसम्पन्न करें, जिससे हम अपने वेदवेत्ता स्तोता आदि विद्वानों को प्रसन्न करें, जो हमारे प्रति आपकी स्तुति उच्चस्वर से वर्णन करते हैं, या यों कहो कि परमात्मस्तुति-कीर्तन करते हुए हमको आपकी उपासना में प्रवृत्त करते हैं। हे भगवन् ! आप हममें ऐसी शक्ति प्रदान करें कि कठिन से कठिन मार्गों के द्वारों को खोलकर आपका दर्शन कर सकें ॥४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

गृह स्वामिनी

पदार्थान्वयभाषाः - पदार्थ- जैसे 'उषस्' अर्थात् कान्तियुक्त विद्युत् को (वृषभस्य रवेण) = वर्षणशील मेघ के घोर गर्जन के साथ ही (जज्ञुः) = जानते हैं और वह (दृढस्य अद्रेः दुरः वि और्णोत्) = दृढ़ मेघ पर्वतादि के जलावरोधक मार्गों को खोल देती हैं वैसे ही हे विदुषी वधू! (यां त्वा) = जिस तुझको (वृषभस्य) = उत्तम पुरुष के (रवेण) = उपदेश या नाम शब्द से लोग (जज्ञुः) = जान लेते हैं वह तू (दृढस्य अद्रेः) = दृढ़ 'अद्रि' अर्थात् पर्वतवत् विशाल भवन के (दुर:) = नाना द्वारों को (वि और्णो:) = उद्घाटन कर, तू गृहपति की स्वामिनी हो और (यावत्) = जितना तू (गृणाना) = स्तुतियुक्त होकर (स्तोतृभ्यः अरदः) = विद्वानों को देवे (तावत् राधः) = उतना ही धन (अस्मभ्यं) हमें प्रदान कर ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-विदुषी वधू अपने श्रेष्ठ गुणों व कर्मों से इतनी विख्यात होवे कि लोग उसके नाम से परिचित हो जावें। वह अपने घर की स्वामिनी होकर परोपकार में दान देवे।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (उषः) हे ज्ञानस्वरूप परमात्मन् ! (अस्मभ्यम्) अस्मदर्थम् (अरदः) आदौ (तावत् राधः रास्व) तावत् धनं प्रयच्छ (यावत्) यावता वयं (गृणाना) त्वां गृणतः (स्तोतृभ्यः) स्तोतॄन् विदुषः प्रसादयेम (याम् त्वा) यं त्वां (वृषभस्य रवेण जज्ञुः) वृषभवत् उच्चस्वरेण प्रकटयन्ति स्तुवन्ति, तथा चास्मभ्यं (दृळ्हस्य दुरः अद्रेः) दृढतायुक्तानतिकठिनमार्गान् (वि) सम्यक् (और्णोः) विवृतान् कुरु ॥४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O dawn of the light of divinity, give us ample wealth and competence for the good life, as much as you grant to the devout celebrants who have adored you since eternity and known you by the roar of thunder, the shower of clouds, and the bellowing of the bull, when you open the caves of mighty mountains and clouds and unveil the folds of darkness from over the light of the sun.