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देवता: उषाः ऋषि: वसिष्ठः छन्द: त्रिष्टुप् स्वर: धैवतः

प्रति॑ के॒तव॑: प्रथ॒मा अ॑दृश्रन्नू॒र्ध्वा अ॑स्या अ॒ञ्जयो॒ वि श्र॑यन्ते । उषो॑ अ॒र्वाचा॑ बृह॒ता रथे॑न॒ ज्योति॑ष्मता वा॒मम॒स्मभ्यं॑ वक्षि ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

prati ketavaḥ prathamā adṛśrann ūrdhvā asyā añjayo vi śrayante | uṣo arvācā bṛhatā rathena jyotiṣmatā vāmam asmabhyaṁ vakṣi ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्रति॑ । के॒तवः॑ । प्र॒थ॒माः । अ॒दृ॒श्र॒न् । ऊ॒र्ध्वाः । अ॒स्याः॒ । अ॒ञ्जयः॑ । वि । श्र॒य॒न्ते॒ । उषः॑ । अ॒र्वाचा॑ । बृ॒ह॒ता । रथे॑न । ज्योति॑ष्मता । वा॒मम् । अ॒स्मभ्य॑म् । व॒क्षि॒ ॥ ७.७८.१

ऋग्वेद » मण्डल:7» सूक्त:78» मन्त्र:1 | अष्टक:5» अध्याय:5» वर्ग:25» मन्त्र:1 | मण्डल:7» अनुवाक:5» मन्त्र:1


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आर्यमुनि

अब परमात्मा का स्वरूप वर्णन करते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - हे परमात्मन् ! (अस्याः) आपकी इस महती शक्ति के (प्रथमाः) पहले (केतवः) अनेक हेतु (ऊर्ध्वाः) सबसे ऊँचे (प्रति) हमारे प्रति (अञ्जयः) प्रसिद्ध (अदृश्रन्) देखे जाते हैं अर्थात् हमें स्पष्ट दिखाई देते हैं, जो (विश्रयन्ते) विस्तारपूर्वक फैले हुए हैं। (उषः) हे ज्योतिस्वरूप भगवन् ! (अर्वाचा) आप हमारे सम्मुख आयें अर्थात् हमें अपने दर्शन का पात्र बनायें और (ज्योतिष्मता) अपने तेजस्वी (बृहता) बड़े (रथेन) ज्ञान से (अस्मभ्यं) हमको (वामं) ज्ञानरूप धन (वक्षि) प्रदान करें ॥१॥
भावार्थभाषाः - जब इस संसार में दृष्टि फैलाकर देखते हैं, तो सबसे पहले परमात्मस्वरूप को बोधन करनेवाले अनन्त हेतु इस संसार में हमारे दृष्टिगत होते हैं, जो सब से उच्च परमात्मस्वरूप को दर्शा रहे हैं, जैसा कि संसार की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय और यह अद्भुत रचना आदि चिह्नों से स्पष्टतया परमात्मा के स्वरूप का बोधन होता है। हे सर्वशक्तिसम्पन्न भगवन् ! आप अपने बड़े तेजस्वी स्वरूप का हमें ज्ञान करायें, जिससे हम अपने आपको पवित्र करें ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

गुणवती स्त्री

पदार्थान्वयभाषाः - पदार्थ- (अस्याः) = उस विदुषी स्त्री के (प्रथमाः केतवः) = श्रेष्ठ गुण (रश्मिवत्) = प्रति (अदृश्रन्) = दिखाई दें। (अस्याः) = इसके (अञ्जयः) = गुण प्रकाशवत् (वि-श्रयन्ते) = विविध प्रकार से प्रकट हों। हे (उषः) = कान्तिमति ! तू (ज्योतिष्मता) = तेजस्वी, ज्ञानी (बृहता) = बड़े (अर्वाचा) = अश्व से चलनेवाले (रथेन) = रथ के समान दृढ़, रम्य, पति के साथ मिलकर (अस्मभ्यम्) = हमारे लिए (म्) = उत्तम गुणों को (वक्षि) धारण कर ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- विदुषी स्त्री तेजस्विनी, ज्ञानी तथा पुष्ट शरीरवाली होकर पति के साथ मिलकर अपने श्रेष्ठ गुणों को प्रदर्शित करे।
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आर्यमुनि

सम्प्रति परमात्मनः स्वरूपं वर्ण्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे परमात्मन् ! (अस्याः) अस्या भवदीयमहाशक्तेः (प्रथमाः) आद्याः (केतवः) अनेकहेतवः (ऊर्ध्वाः) अत्युच्चाः (प्रति) मां प्रति (अञ्जयः) प्रसिद्धाः (अदृश्रन्) दृश्यन्ते अर्थान्मया सुस्पष्टा दृश्यन्ते ये (वि श्रयन्ते) विस्तीर्य प्रसृताः (उषः) हे ज्योतिःस्वरूपभगवन् ! (अर्वाचा) भवान् मत्सम्मुखो भवतु अर्थान्मां स्वदर्शनपात्रं विदधातु (ज्योतिष्मता) तथा च स्वतेजस्विना (बृहता) महता (रथेन) ज्ञानेन (अस्मभ्यम्) अस्मभ्यं (वामम्) ज्ञानात्मकधनं (वक्षि) ब्रवीतु–प्रददातु ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The first flames of the dawn are visible, the rays of its light rise and radiate upward on the firmament. O dawn, light of divinity, come hither to us and bring us the beauty and glory of the wealth of the world by your great and grand chariot of light.