पदार्थान्वयभाषाः - पदार्थ - (अह्वां नेत्री) = प्रभात वेला जैसे दिनों की प्रारम्भिक नायिका, (गवां माता) = किरणों को अपने में से माता के समान पैदा करती है, वह (हिरण्य-वर्णा) = सुवर्ण-समान चमकती हुई (सुदृशीक-सन्दृग्) = आँखों को सब पदार्थ अच्छी प्रकार दिखलाती है, वह (प्रतीची) = प्रत्यक्ष होती हुई, (स-प्रथा) = विस्तृत होकर (रुशद् वासः बिभ्रती) = मानो चमकीला वस्त्र पहने (विश्वं शुक्रम् अश्वैत्) = समस्त संसार को दीप्तियुक्त कर चमका देती और बढ़ती है वैसे ही परमेश्वरी शक्ति और नव वधू माता भी (अह्नां) = न नाश होनेवाले, नित्य जीवों, न मरने योग्य बालक जीवों को (नेत्री) = प्राप्त करानेवाली, (गवां) = लोकों और गौ आदि पशुओं को भी माता-माता के समान पालक। (सुदृशीकसंदृग्) = सम्यक् दृष्टि से युक्त, रमणीय वर्णवाली हो । वह (प्रतीची) = प्रत्येक की दृष्टि में पूजनीय, (रुशद्-वासः) = उज्ज्वल वस्त्रादि (बिभ्रती) = धारण करती हुई, (सप्रथा) = समान रूप से विख्यात होकर (उत्-अस्थात्) = उत्तम स्थिति प्राप्त करे और (शुक्रम् अश्वैत्) = शुद्ध आचरण करे।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- माता बननेवाली नव वधू अपनी होनेवाली सन्तान को दीर्घायु तथा स्वस्थ, पुष्ट् बनाने के लिए श्रेष्ठ चिन्तन व शुद्ध आचरण करे। अपनी दृष्टि व वस्त्रादि को उज्ज्वल रखे इससे समाज में उसका सम्मान व प्रतिष्ठा बढ़ेगी।