वांछित मन्त्र चुनें

त इद्दे॒वानां॑ सध॒माद॑ आसन्नृ॒तावा॑नः क॒वय॑: पू॒र्व्यास॑: । गू॒ळ्हं ज्योति॑: पि॒तरो॒ अन्व॑विन्दन्त्स॒त्यम॑न्त्रा अजनयन्नु॒षास॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ta id devānāṁ sadhamāda āsann ṛtāvānaḥ kavayaḥ pūrvyāsaḥ | gūḻhaṁ jyotiḥ pitaro anv avindan satyamantrā ajanayann uṣāsam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ते । इत् । दे॒वाना॑म् । स॒ध॒ऽमादः॑ । आ॒स॒न् । ऋ॒तऽवा॑नः । क॒वयः॑ । पू॒र्व्यासः॑ । गू॒ळ्हम् । ज्योतिः॑ । पि॒तरः॑ । अनु॑ । अ॒वि॒न्द॒न् । स॒त्यऽम॑न्त्राः । अ॒ज॒न॒य॒न् । उ॒षस॑म् ॥ ७.७६.४

ऋग्वेद » मण्डल:7» सूक्त:76» मन्त्र:4 | अष्टक:5» अध्याय:5» वर्ग:23» मन्त्र:4 | मण्डल:7» अनुवाक:5» मन्त्र:4


0 बार पढ़ा गया

आर्यमुनि

अब ब्रह्मवेत्ता विद्वानों का कर्तव्य कथन करते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (देवानां सधमादः) विद्वानों के समुदायरूप यज्ञ में (ते इत्) वे ही (ऋतावानः) सत्यवादी (कवयः) कवि (पूर्व्यासः) प्राचीन (आसन्) माने जाते थे, जो (गूळ्हम्) गहन ज्योतिप्रकाश परमात्मा को (अनु अविन्दन्) भले प्रकार जानते थे, (सत्यमन्त्राः) वे सत्य का उपदेश करनेवाले (पितरः) पितर (उषसं) परमात्मप्रकाश को (अजनयन्) प्रकट करते थे ॥४॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे मनुष्यों ! विद्वानों के यज्ञ में वही सत्यवादी, वही कवि, वही प्राचीन उपदेष्टा और वही पितर माने जाते हैं, जो परमात्मा  के गुप्तभाव को प्रकाशित करते हैं अर्थात् विद्वत्ता तथा कवित्व उन्हीं लोगों का सफल होता है, जो परमात्मा के गुणों को कीर्तन द्वारा सर्वसाधारण तक पहुँचाते हैं ॥४॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

ज्ञानी पुरुष

पदार्थान्वयभाषाः - पदार्थ- जो (ऋतावान:) = सत्य, वेद, तप आदि का सेवन करनेवाले (पूर्व्यासः कवयः) = पूर्व के विद्वानों से शिक्षित, क्रान्तदर्शी पुरुष हैं (ते इत्) = वे ही (देवानां) = विद्वान् पुरुषों के (सधमादः आसन्) = साथ आनन्द प्राप्त करनेवाले होते हैं। वे ही (पितरः) = माता-पितावत् पालक बनकर (गूढं ज्योतिः) = भीतर छिपे तेज को (अनु अविन्दन्) = प्राप्त करते हैं। जो (सत्य-मन्त्राः) = सत्य, मननशील होकर (उषासम् अजनयन्) = अज्ञान और पाप को दूर करनेवाली 'विशोका' प्रज्ञा को प्रकट करते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- श्रेष्ठ पुरुषों को योग्य है कि वे सत्य ज्ञानी तपस्वी वेद के विद्वानों के सान्निध्य में रहकर अपने अन्दर के तेज को प्राप्त करके सत्य का चिन्तन करते हुए अज्ञान की नाशक 'विशोका' नाम की बुद्धि को प्राप्त करें।
0 बार पढ़ा गया

आर्यमुनि

इत आरभ्य ब्रह्मवेतृ विदुषां कर्त्तव्यं वर्ण्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - (देवानाम् सधमादः) विदुषां समुदायात्मके यज्ञे (ते इत्) त एव (ऋतावानः) सत्यवादिनः (कवयः) विचक्षणाः (पूर्व्यासः) पुरातनाः (आसन्) अमंसत, ये (गूळ्हम्) गहनं ज्योतिःस्वरूपं परमात्मानं (अनु अविन्दन्) साधु अज्ञासिषुः (सत्यमन्त्राः) ते सत्योपदेशकर्तारः (पितरः) पितरो वृद्धाः (उषसम्) परमात्मप्रकाशं (अजनयन्) प्रादुरबीभवन् ॥४॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - They alone share communion and union with divinities in the house of meditative yajna who, dedicated to divine truth and law, are veteran visionaries and creative poets, who are sagely father figures and realise the mysterious sublimity of light divine, and who, having realised and mastered the activating mantra, recreate and reveal the light of divinity in spiritual vision.