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आ गोम॑ता नासत्या॒ रथे॒नाश्वा॑वता पुरुश्च॒न्द्रेण॑ यातम् । अ॒भि वां॒ विश्वा॑ नि॒युत॑: सचन्ते स्पा॒र्हया॑ श्रि॒या त॒न्वा॑ शुभा॒ना ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ā gomatā nāsatyā rathenāśvāvatā puruścandreṇa yātam | abhi vāṁ viśvā niyutaḥ sacante spārhayā śriyā tanvā śubhānā ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ । गोऽम॑ता । ना॒स॒त्या॒ । रथे॑न । अश्व॑ऽवता । पु॒रु॒ऽच॒न्द्रेण॑ । या॒त॒म् । अ॒भि । वा॒म् । विश्वाः॑ । नि॒ऽयुतः॑ । स॒च॒न्ते॒ । स्पा॒र्हया॑ । श्रि॒या । त॒न्वा॑ । शु॒भा॒ना ॥ ७.७२.१

ऋग्वेद » मण्डल:7» सूक्त:72» मन्त्र:1 | अष्टक:5» अध्याय:5» वर्ग:19» मन्त्र:1 | मण्डल:7» अनुवाक:5» मन्त्र:1


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आर्यमुनि

अब इस सूक्त में यज्ञों का वर्णन करते हुए यजमानों की प्रार्थना कथन करते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (नासत्या) सत्यवादी अध्यापक तथा उपदेशक (गोमता) प्रकाशवाले (अश्ववता) शीघ्रगामी (पुरुश्चन्द्रेण) अत्यन्त आनन्द उत्पन्न करनेवाले (रथेन) रथ=यान द्वारा (आयातं) हमारे यज्ञ में आयें और (श्रिया तन्वा) सुशोभित शरीर से (शुभाना) शोभा को प्राप्त हुए (वां) उनको (अभि) सब ओर से (स्पार्हया) प्रेमयुक्त (विश्वाः) सम्पूर्ण (नियुतः) स्तुतियें (सचन्ते) सङ्गत हों ॥१॥
भावार्थभाषाः - हे यजमानो ! आप लोग सदैव मन, वाणी तथा शरीर से ऐसे यत्नवान् हों, जिससे तुम्हारे यज्ञों को सत्यवादी विद्वान् आकर सुशोभित करें और आप लोग सब ओर से उनकी स्तुति करते हुए अपने आचरणों को पवित्र बनायें, क्योंकि सत्यवादी विद्वानों की सङ्गति से ही पुरुषों में उच्च भाव उत्पन्न होते हैं, अन्यथा नहीं ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

स्वस्थ शरीर

पदार्थान्वयभाषाः - पदार्थ - हे विद्वान् स्त्री-पुरुषो! हे (नासत्या) = नासिकावत् प्रमुख स्थान पर विराजनेवाले (प्रतिष्ठित) = जनो! आप दोनों गोमता उत्तम बैलोंवाले वा (अश्ववता) = घोड़ोंवाले (पुरु चन्द्रेण) = बहुतों के आह्लादक (रथेन) = रथ से (आ यातम्) = आओ। (विश्वा नियुतः) = सब उत्तम प्रजाएँ वा सेनाएँ (वाम् अभि सचन्ते) = आप दोनों की ही सेवा करती हैं। आप दोनों (स्पार्हया) = स्पृहायोग्य, मनोहर (श्रिया) = शोभा और (तन्वा) = स्वस्थ शरीर से (शुभाना) = शोभित होकर हमें प्राप्त होओ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- विद्वान् स्त्री-पुरुष स्वस्थ व सुन्दर शरीरवाले हों। इससे अन्य प्रजा जन उन्हें आदर्श मानकर स्वस्थ व सुन्दर बनने का पुरुषार्थ करेंगे।
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आर्यमुनि

अस्मिन् सूक्ते यज्ञान् निरूपयन् यजमानस्य प्रार्थनामाह।

पदार्थान्वयभाषाः - (नासत्या) सत्यवादिनोध्यापकास्तथोपदेशकाः (गोमता) प्रकाशयुक्तेन (अश्ववता) शीघ्रगामिना (पुरुश्चन्द्रेण) आनन्दप्रदेन (रथेन) यानेन (आ यातम्) आगच्छन्तु अन्यच्च (श्रिया) शोभायुक्तेन (तन्वा) शरीरेण (शुभाना) शोभितान् (वाम्) तान् अध्यापकोपदेशकान् (अभि) सर्वतः (स्पार्हया) प्रेमयुक्ताः सत्यः (विश्वाः) सम्पूर्णाः (नियुतः) स्तुतयः (सचन्ते) प्राप्ता भवन्तु। अध्यापकोपदेशकाः सर्वैर्जनैः स्तोतव्याः स्युरिति भावः ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O saints, scholars and scientists, dedicated to truth and the law of nature and divinity, handsome of form and person with enviable grace and splendour, come to our yajna by your swift, scientific and brilliant chariot. All your admirers and allied cooperative powers wait for you.