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अ॒स॒श्चता॑ म॒घव॑द्भ्यो॒ हि भू॒तं ये रा॒या म॑घ॒देयं॑ जु॒नन्ति॑ । प्र ये बन्धुं॑ सू॒नृता॑भिस्ति॒रन्ते॒ गव्या॑ पृ॒ञ्चन्तो॒ अश्व्या॑ म॒घानि॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

asaścatā maghavadbhyo hi bhūtaṁ ye rāyā maghadeyaṁ junanti | pra ye bandhuṁ sūnṛtābhis tirante gavyā pṛñcanto aśvyā maghāni ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒स॒श्चता॑ । म॒घव॑त्ऽभ्यः । हि । भू॒तम् । ये । रा॒या । म॒घ॒ऽदेय॑म् । जु॒नन्ति॑ । प्र । ये । बन्धु॑म् । सू॒नृता॑भिः । ति॒रन्ते॑ । गव्या॑ । पृ॒ञ्चन्तः॑ । अश्व्या॑ । म॒घानि॑ ॥ ७.६७.९

ऋग्वेद » मण्डल:7» सूक्त:67» मन्त्र:9 | अष्टक:5» अध्याय:5» वर्ग:13» मन्त्र:4 | मण्डल:7» अनुवाक:4» मन्त्र:9


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आर्यमुनि

अब परमात्मप्राप्ति के अधिकारियों का वर्णन करते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (हि) निश्चय करके (ये) जो (राया) धन द्वारा (मघदेयं) हव्यादि पदार्थ (जुनन्ति) नियुक्त करते (असश्चता) किसी विषय में आसक्त न होकर (मधवद्भ्यः) ऋत्विगादिकों को (भूतं) धन दान देते (ये) जो (प्र) प्रसन्नतापूर्वक (बन्धु) अपने बन्धुओं को (सूनृताभिः) सुन्दर वाणियों द्वारा (तिरन्ते) बढ़ाते और जो (गव्या) गौयें (मघानि) धन (अश्व्या) घोड़े (पृञ्चन्तः) अर्थियों को देते हैं, वे परमात्मप्राप्ति के अधिकारी होते हैं ॥९॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा उपदेश करते हैं कि जो यम-नियमादिकों से सम्पन्न अर्थात् किसी विषय में फँसे हुए नहीं, सत्पुरुषों को धनादि पदार्थ देने में उदार, प्रसन्न चित्त से मीठी वाणी बोलकर अपने सम्बन्धियों को प्रसन्न रखते और सत्यभाषण तथा सत्य का प्रचार करते हैं, वे उदार पुरुष परमात्मपद के अधिकारी होते हैं ॥९॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

दुर्गुण त्याग

पदार्थान्वयभाषाः - पदार्थ- हे नर-नारियो ! (ये) = जो (राया) = ऐश्वर्य बल से (मघ-देयं) = दातव्य ऐश्वर्य (जुनन्ति) = देते हैं उन (मघवद्भ्यः) = ज्ञान-धनशाली पुरुषों के उपकार हेतु आप लोग (असश्चता हि भूतम्) = दुर्व्यसनों में असक्त रहो। (ये) = जो लोग (अश्व्या) = अश्वयुक्त और (गव्या) = गौवों से समृद्ध (मघानि) = धनों को (पृञ्चन्तः) = प्राप्त करते हुए (सूनृताभिः) = उत्तम वाणियों और अन्नों से (बन्धुं) = बन्धुजन को (प्र तिरन्ते) = अच्छी प्रकार बढ़ाते हैं उनके लिये आप विषयादि में न फँसकर सेवा में तत्पर रहो।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- उत्तम स्त्री-पुरुष दुर्व्यव्यसनों में कभी न फँसें तथा परोपकार के कार्यों में सदैव दान देते हुए सेवा कार्यों में तत्पर रहें।
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आर्यमुनि

अथ परमात्मप्राप्त्यधिकारिणो वर्ण्यन्ते।

पदार्थान्वयभाषाः - (हि) निश्चयेन (ये) ये जनाः (राया) धनेन युक्ताः (मघदेयं) हविर्लक्षणं पदार्थं (जुनन्ति) युञ्जन्ति (असश्चता) विषयेषु अक्षताः सन्तः (मघवद्भ्यः) ऋत्विगादिभ्यः (भूतं) प्रभूतं धनं (ये) ये जना ददति अन्यच्च ये (बन्धुं) स्वबन्धुं (सूनृताभिः) सत्यवचोभिः (प्रतिरन्ते) वर्धयन्ति अन्यच्च ये (गव्या) गोरूपाणि (मघानि) धनानि (अश्व्या) अश्वरूपाणि च (पृञ्चन्तः) अर्थिभ्यः प्रयच्छन्तस्ते परमात्मप्राप्तेरधि-कारिणो भवन्ति ॥९॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Never forsake the generous : Be inexhaustible sources of incentive and encouragement for those who support charity with means and materials, those who help out friends and relatives in distress, and those who give liberal gifts of lands, cows and knowledge and things the needy love and desire.