पदार्थान्वयभाषाः - पदार्थ- हे (अश्विना) = अश्वरूप इन्द्रियों के स्वामी, नर-नारी वर्गो! हे (नासत्या) = कभी असत्य व्यवहार न करनेवाले वा (न-असत्-यौ) = कभी असत्, कुमार्ग पर न जानेवाले जनो! (सुहोता) = उत्तम ज्ञानदाता (वि वक्वान्) = विविध विद्याओं का उपदेष्टा पुरुष (स्तोमैः) = वेद मन्त्रों और उपदेशों से (नूनम्) = अवश्य (वां) = तुम दोनों को (अभि सिषक्ति) = अपने साथ एक सूत्र में बाँधता है, आप दोनों (वसुमता रथेन) = धन, अन्नादि सम्पन्न रथ से यात्री जैसे सुख से देशान्तर चला जाता है वैसे ही (वसु-मता) = शिष्यों से युक्त, (रथेन) = स्थिर भाव के विद्यमान, (स्वर्विदा) = ज्ञान के प्रकाश को स्वयं प्राप्त और अन्यों को प्राप्त करानेवाले आचार्य की सहायता से (पूर्वीभिः) = पूर्व विद्वानों से उपदिष्ट, (पथ्याभिः) = हितकारी मार्गों से (अर्वाक् यातम्) आगे बढ़ो।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- जितेन्द्रिय विद्वान् पुरुष वेदमन्त्रों का उपदेश करके अपने शिष्य वर्ग स्त्री, पुरुष, जनों को विविध विद्याओं का ज्ञान प्रदान कर, असत्य व्यवहार तथा कुमार्ग से बचाकर संयमी बनाता है। उन्हें इतना योग्य बना देता है कि वे भी अपने शिष्यों को उत्तमता पूर्वक ज्ञान के उपदेश करके -शिष्य परम्परा को आगे बढ़ा सकें।