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अशो॑च्य॒ग्निः स॑मिधा॒नो अ॒स्मे उपो॑ अदृश्र॒न्तम॑सश्चि॒दन्ता॑: । अचे॑ति के॒तुरु॒षस॑: पु॒रस्ता॑च्छ्रि॒ये दि॒वो दु॑हि॒तुर्जाय॑मानः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

aśocy agniḥ samidhāno asme upo adṛśran tamasaś cid antāḥ | aceti ketur uṣasaḥ purastāc chriye divo duhitur jāyamānaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अशो॑चि । अ॒ग्निः । स॒म्ऽइ॒धा॒नः । अ॒स्मे इति॑ । उपो॒ इति॑ । अ॒दृ॒श्र॒न् । तम॑सः । चि॒त् । अन्ताः॑ । अचे॑ति । के॒तुः । उ॒षसः॑ । पु॒रस्ता॑त् । श्रि॒ये । दि॒वः । दु॒हि॒तुः । जाय॑मानः ॥ ७.६७.२

ऋग्वेद » मण्डल:7» सूक्त:67» मन्त्र:2 | अष्टक:5» अध्याय:5» वर्ग:12» मन्त्र:2 | मण्डल:7» अनुवाक:4» मन्त्र:2


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आर्यमुनि

अब उपदेश का समय कथन करते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (अस्मे) जब (पुरस्तात्, श्रिये) पूर्वदिशा को आश्रयण किये हुए (दिवः, दुहितुः) द्युलोक से अपनी दुहिता उषा को लेकर (जायमानः) उदय होता हुआ (केतुः) सूर्य्य (अचेति) जान पड़े और (तमसः, चित्, अन्ताः) अन्धकार का भले प्रकार अन्त=नाश (उपो, अदृश्रन्) दीखने लगे, तब (समिधानः, अग्निः, अशोचि) समिधाओं द्वारा अग्नि को प्रदीप्त करो ॥२॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे उपदेशको ! अन्धकार के निवृत्त होने पर सूर्योदयकाल में अपने सन्ध्या-अग्निहोत्रादि नित्य कर्म करो और राजा तथा प्रजा को भी इसी काल में उक्त कर्म करने तथा अन्य आवश्यक कर्मों के करने का उपदेश करो, क्योंकि उपदेश का यही अत्युत्तम समय है। इस समय सबकी बुद्धि उपदेश ग्रहण करने के लिए उद्यत होती है ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

गुरु शिष्य

पदार्थान्वयभाषाः - पदार्थ- (समिधानः) = अच्छी प्रकार दीप्त (अग्निः) = यज्ञाग्नि, ज्ञानाग्नि, सूर्य एवं (अग्निवत्) = तेजस्वी विद्वान् (अस्मे अशोचि) = हमारे हितार्थ चमके। (तमसः अन्ताः चित्) = अन्धकार अज्ञान के परले सिरे तक (उपो अदृश्रन्) = स्पष्ट दिखाई दे । (दिवः दुहितुः उषस:) = दीप्त सूर्य कन्या के समान उषा से ही (पुरस्तात् श्रिये) = पूर्व दिशा की शोभा के लिये जैसे सूर्य उत्पन्न होता है वैसे ही (दिवः दुहितुः) = ज्ञानप्रकाश का दोहन करनेवाले, (उषसः) = पापों और अज्ञान के नाशक (मातृवत्) = गुण से (जायमानः) = उत्पन्न होता हुआ शिष्यरूप पुत्र (पुरुस्तात्) = आगे शोभा के लिये ही (केतुः अचेति) = पूर्ण ज्ञानवान् होकर प्रबुद्ध होता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- तेजस्वी विद्वान् गुरु माता के समान शिष्य को अपने गुरुकुलरूपी गर्भ में धारण करके उसे ज्ञान की अग्नि से दीप्त करता है। उसके पापों और अज्ञान का नाश करके पूर्ण ज्ञानवान् बनाकर प्रबुद्ध करता है।
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आर्यमुनि

अथोपदेशस्य समयोऽभिधीयते।

पदार्थान्वयभाषाः - यस्मिन्काले (पुरस्तात्) पूर्वस्यां दिशि (दिवः) द्युलोकस्य (दुहितुः) कन्यायाः (उषसः) प्रकाशः (श्रिये) शोभायै (जायमानः) उत्पन्नो भवेत्, अन्यच्च (केतुः) सूर्य्यः (अचेति) ज्ञातो भवेत्, अन्यच्च (तमसश्चित्) अन्धकारस्यापि (अन्ताः) नाशो भवेत् अन्यच्च (उपो, अदृश्रन्) उपदृष्टं भवेत्, तदा (समिधानः) समिध्यमानः (अग्निः) पावकः (अशोचि) दीप्यते, तस्मिन्प्रदीप्तेऽग्नौ (अस्मे) अस्माभिः हवनं कार्यमिति शेषः ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The fire of morning yajna is kindled and shines for us, and the end of darkness is seen close at hand. The sun is rising in the east like an honour flag of the glory of the dawn, daughter of heaven.