वीर सेनापति व श्रेष्ठ व्यापार
पदार्थान्वयभाषाः - पदार्थ - हे (राजाना) = राजा रानी, वा राजा सेनापति तुल्य प्रजाओं में प्रकाशित (महः ऋतस्य गोपा) = बड़े धनैश्वर्य और ज्ञान के रक्षक, (सिन्धु-पती) = वेगवान् अश्वों, समुद्रवत् विशाल प्रजाजनों, सैन्यों तथा प्राणों के पालक, (क्षत्रिया) = बलशाली होकर तुम दोनों (अर्वाक् यातम्) = आगे बढ़ो। हे (जीर-दानू) = मेघ और वायु तुल्य संसार को वेग, जीवन और प्राण देनेवाले! (मित्रावरुणा) = स्नेहयुक्त और वरणीय श्रेष्ठ जनो जैसे वायु और मेघ वा विद्युत् और सूर्य दोनों (दिवः वृष्टिम् इन्वतः) = आकाश से वृष्टि लाते हैं और (दिवः इडाम् इन्वतम्) = भूमि से अन्न को उत्पन्न करते हैं वैसे ही आप दोनों (दिवः) = व्यापार आदि से (वृष्टिम् अव इन्वतम्) = समृद्धि की वृष्टि प्राप्त कराओ (उत) = और (नः) = हमें (इडां अव इन्वतम्) = उत्तम वाणी और अन्न-सम्पदा प्राप्त कराओ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ राष्ट्र में राजा को योग्य है कि वह वीर पुरुष को सेनापति नियुक्त करे जो प्रजा की सब प्रकार से रक्षा करे तथा श्रेष्ठ व्यापारियों को प्रोत्साहित करे कि वे देश-विदेश में व्यापार करके राष्ट्र के लिए धनैश्वर्य की वृद्धि करें जिससे प्रजा अन्न व सम्पत्ति से युक्त होवे ।