पदार्थान्वयभाषाः - पदार्थ- सूर्य जैसे (दिवः रुक्म) = आकाश में सुवर्ण आभरण तुल्य देदीप्यमान (उरु-चक्षा:) = विशाल आकाश और लोकों का प्रकाशक (तरणिः) = आकाश पार करनेवाला, (भ्राजमानः) = चमकता हुआ (दूरे-अर्थ:) = दूर-दूर तक स्वयं प्रकाश फैलाता हुआ उदेति उदय होता है और (जनाः) = मनुष्य, जन्तुगण (सूर्येण प्रसूता:) = सूर्य द्वारा प्रेरित होकर (अर्थानि अयन्) = पदार्थ प्राप्त करते और (अपांसि कृणवन्) = कर्म करते हैं। वैसे ही (तरणिः) = नौका-तुल्य जीवों को दुःखों से पार करनेवाला, (भ्राजमानः) = तेजस्वी, (दूरे अर्थ:) = दूर-दूर तक जानेवाला, दूर से भी धन प्राप्त करनेवाला, (उरु चक्षाः) = बहुदर्शी पुरुष (दिवः रुक्म) = कामनावान् प्रजा के बीच सुशोभित, उनको प्रिय होता है और (जना:) = सब जन, ऐसे (सूर्येण) = सूर्यवत् ज्ञान और तेज से युक्त पुरुष से (प्रसूता:) = प्रेरित और शिक्षित से होकर (अर्थानि प्रयन्) = अपने प्राप्य पदार्थों को प्राप्त हों और (अपांसि कृण्वन्) = नाना कर्म करें।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- ज्ञानी पुरुष राष्ट्र में कर्मशील होकर अपने जीवन व्यवहार से प्रजा के समक्ष आदर्श प्रस्तुत करे। जलमार्ग आदि से अन्य देशों के साथ व्यापार करके राष्ट्र में धन की वृद्धि करता है। अन्य देशों से सामान लाकर अपनी प्रजा में उन पदार्थों की कमी को पूरा करके लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। इससे अन्य लोग भी प्रेरणा पाकर राष्ट्र को समृद्ध बनाने के लिए इस कार्य को बढ़ाते हैं।