पदार्थान्वयभाषाः - पदार्थ- जैसे (देवः सविता) = प्रकाशमान् सूर्य, (उषसाम् उपस्थात्) = उषाओं में से (विभ्राजमानः) = विशेष चमकता हुआ, (रेभैः) = स्तुतिकर्ता जीवों से (अनुमद्यमानः) = स्तुत होकर उदेति उदय होता है वह (समानं धाम न प्रमिनाति) = सबको प्राप्त तेज को नष्ट नहीं करता है, वैसे ही (यः) = जो महापुरुष, (समानं धाम) = अपने एक समान, अनुरूप तेज, नाम, स्थान पद को (न प्र-मिनाति) = नष्ट नहीं करता तो भी (उषसाम्) = प्रभात-वेलाओं के समान उत्तम अनुराग-युक्त प्रजाओं (रेभैः) = विद्वानों द्वारा (अनु-मद्यमानः) = स्तुति एवं उपदेश किया जाकर (उद् एति) = विद्या-प्रकाश तथा बल-दीप्ति से उदय को प्राप्त होता, उन्नत पद प्राप्त करता है, (एषः) = वह (मे) = मेरा (देवः) = ज्ञानदाता पुरुष वा ऐश्वर्यप्रद राजा (सविता) = उत्पादक पितावत् (चच्छन्द) = गृहवत् शरण दे।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- उत्तम ज्ञानी पुरुषों को योग्य है कि वे अपने ज्ञानोपदेश द्वारा लोगों को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करें। लोगों को बतावें कि प्रातः उषाकाल में जागकर ईश्वर की स्तुति करें। विद्वानों का संग कर ज्ञान एवं बल की प्राप्ति करें तथा योग्य शिक्षा पाकर उन्नत पदों को भी प्राप्त करें।