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नू मि॒त्रो वरु॑णो अर्य॒मा न॒स्त्मने॑ तो॒काय॒ वरि॑वो दधन्तु । सु॒गा नो॒ विश्वा॑ सु॒पथा॑नि सन्तु यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभि॒: सदा॑ नः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

nū mitro varuṇo aryamā nas tmane tokāya varivo dadhantu | sugā no viśvā supathāni santu yūyam pāta svastibhiḥ sadā naḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

नु । मि॒त्रः । वरु॑णः । अ॒र्य॒मा । नः॒ । त्मने॑ । तो॒काय॑ । वरि॑वः । द॒ध॒न्तु॒ । सु॒ऽगा । नः॒ । विश्वा॑ । सु॒ऽपथा॑नि । स॒न्तु॒ । यू॒यम् । पा॒त॒ । स्व॒स्तिऽभिः॑ । सदा॑ । नः॒ ॥ ७.६२.६

ऋग्वेद » मण्डल:7» सूक्त:62» मन्त्र:6 | अष्टक:5» अध्याय:5» वर्ग:4» मन्त्र:6 | मण्डल:7» अनुवाक:4» मन्त्र:6


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (नु) निश्चय करके (मित्रः) अध्यापक (वरुणः) उपदेशक (अर्यमा) न्यायकारी ये सब विद्वान् (नः) हमारे (त्मने) आत्मा के लिए और (तोकाय) सन्तान के लिए (वरिवः) ऐश्वर्य को (दधन्तु) दें और (नः) हमारे (विश्वाः) सम्पूर्ण (सुपथानि) मार्ग (सुगाः) कल्याणरूप (सन्तु) हों और (यूयम्) आप (स्वस्तिभिः) स्वस्तिवाचन आदि वाणियों से (नः) हमारी (सदा) सर्वदा (पात) रक्षा करें ॥६॥
भावार्थभाषाः - अध्यापक उपदेशक तथा अन्य-अन्य विषयों के ज्ञाता विद्वानों को यजमान लोग अपने यज्ञों में बुलायें और सम्मानपूर्वक उनसे कहें कि हे विद्वद्गण ! आप हमारे कल्याणार्थ स्वस्तिवाचनादि वाणियों से प्रार्थना करें और हमारे लिए कल्याणरूप मार्गों का उपदेश करें ॥६॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

शासक का कर्त्तव्य

पदार्थान्वयभाषाः - पदार्थ- (नु) = अवश्य, शीघ्र ही (मित्रः) = स्नेहवान् और सर्वमित्र विद्वान् (वरुणः) = श्रेष्ठ पुरुष और (अर्यमा) = न्यायकारी पुरुष (नः) = हमारे (त्मने) = अपने लिये (नः तोकाय) = हमारे पुत्र के लिये भी (वरिवः) = उत्तम धन (दधन्तु) = दें जिससे (न:) = हमारे (विश्वा) = सब कार्य (सुगा) = सुगम और (सुपथानि) = उत्तम मार्ग युक्त (सन्तु) = हों। हे विद्वान् जनो! (यूयं नः सदा स्वस्तिभिः पात) = आप हमारी सदा कल्याण-साधनों से रक्षा करें।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- राजा को योग्य है कि वह अपने राज्य में उत्तम विद्वानों तथा निष्पक्ष पुरुषों को न्यायाधीश नियुक्त करें। जिससे प्रजा ज्ञानी होकर पुरुषार्थ पूर्वक धन कमावे तथा उत्तम न्याय प्राप्त कर राष्ट्र में सुरक्षित रहकर सुखी एवं समृद्ध होवे। अगले सूक्त का भी ऋषि वसिष्ठ और देवता सूर्य व मित्रावरुण ही हैं।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (नु) निश्चयेन (मित्रः) अध्यापकः (वरुणः) उपदेशकश्च (अर्यमा) न्यायकारी=विद्वान्, एते सर्वे विद्वांसः (नः) अस्माकं (त्मने) आत्मने (तोकाय) सन्तानाय च (वरिवः) ऐश्वर्य्यं (दधन्तु) प्रयच्छन्तु,   अन्यच्च (नः) अस्माकं (विश्वा, सुपथानि) सर्वे पन्थानः (सुगाः) कल्याणरूपाः (सन्तु) भवन्तु, हे अध्यापकोपदेशकगण ! (यूयम्) भवन्त इत्यर्थः, (स्वस्तिभिः) स्वस्तिवाचनादिभिः (नः) अस्मान् (सदा) सर्वदा (पात) रक्षत ॥६॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Thus O Mitra, Varuna and Aryama, powers of cosmic as well as earthly love and friendship, reason and discrimination, justice and advancement in order, guiding everything from the smallest particle to the cosmos and from the individual human to the world community, bless us with the best of life’s gifts for the enlightenment of our soul and the continuation of our race. Let all our paths of life and living be simple and straight, noble and easy to follow. O powers of health and enlightenment, protect and promote us on our way onward with all modes and means of happiness and well being all round for all time.