यद॒द्य सू॑र्य॒ ब्रवोऽना॑गा उ॒द्यन्मि॒त्राय॒ वरु॑णाय स॒त्यम्। व॒यं दे॑व॒त्रादि॑ते स्याम॒ तव॑ प्रि॒यासो॑ अर्यमन्गृ॒णन्तः॑ ॥१॥
yad adya sūrya bravo nāgā udyan mitrāya varuṇāya satyam | vayaṁ devatrādite syāma tava priyāso aryaman gṛṇantaḥ ||
यत्। अ॒द्य। सू॒र्य॒। ब्रवः॑। अना॑गाः। उ॒त्ऽयन्। मि॒त्राय॑। वरु॑णाय। स॒त्यम्। व॒यम्। दे॒व॒ऽत्रा। अ॒दि॒ते॒। स्या॒म॒। तव॑। प्रि॒यासः॑। अ॒र्य॒म॒न्। गृ॒णन्तः॑ ॥१॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब मनुष्यों को किसकी प्रार्थना करनी चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
सूर्य के समान तेजस्वी बनो
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथ मनुष्यैः कः प्रार्थनीय इत्याह ॥
हे सूर्यादितेऽर्यमन् जगदीश्वर ! यद्योऽनागास्त्वमस्मानुद्यन् सूर्य इव यथा मित्राय वरुणाय सत्यं ब्रवस्तथाऽस्मभ्यं ब्रूहि यतस्स्त्वां देवत्रा गृणन्तो वयं तवाद्य प्रियासस्स्याम ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात सूर्य इत्यादी दृष्टांतांनी विद्वानांच्या गुण व कर्माचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्तांच्या अर्थाची पूर्व सूक्तार्थाबरोबर संगती जाणावी.
