वांछित मन्त्र चुनें

शुची॑ वो ह॒व्या म॑रुतः॒ शुची॑नां॒ शुचिं॑ हिनोम्यध्व॒रं शुचि॑भ्यः। ऋ॒तेन॑ स॒त्यमृ॑त॒साप॑ आय॒ञ्छुचि॑जन्मानः॒ शुच॑यः पाव॒काः ॥१२॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

śucī vo havyā marutaḥ śucīnāṁ śuciṁ hinomy adhvaraṁ śucibhyaḥ | ṛtena satyam ṛtasāpa āyañ chucijanmānaḥ śucayaḥ pāvakāḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

शुची॑। वः॒। ह॒व्या। म॒रु॒तः॒। शुची॑नाम्। शुचि॑म्। हि॒नो॒मि॒। अ॒ध्व॒रम्। शुचि॑ऽभ्यः। ऋ॒तेन॑। स॒त्यम्। ऋ॒त॒ऽसापः॑। आ॒य॒न्। शुचि॑ऽजन्मानः। शुच॑यः। पा॒व॒काः ॥१२॥

ऋग्वेद » मण्डल:7» सूक्त:56» मन्त्र:12 | अष्टक:5» अध्याय:4» वर्ग:24» मन्त्र:2 | मण्डल:7» अनुवाक:4» मन्त्र:12


0 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

कौन इस संसार में पवित्र होते हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (पावकाः) अग्नि के समान प्रताप सहित वर्त्तमान (शुचयः) पवित्र (शुचिजन्मानः) पवित्र जन्मवाले (ऋतसापः) जो सत्य से प्रतिज्ञा करते हैं वे (मरुतः) मरणधर्मा मनुष्यो (शुचीनाम्) पवित्र आचरण करनेवाले (वः) तुम लोगों के जो (शुची) पवित्र (हव्या) देने लेने योग्य वस्तु वर्त्तमान हैं उन (शुचिभ्यः) पवित्र वस्तुओं से वा पवित्र विद्वानों से (शुचिम्) पवित्र को और (ऋतेन) यथार्थ भाव से (सत्यम्) अव्यभिचारी नित्य (अध्वरम्) न नष्ट करने योग्य व्यवहार को (आयन्) जो प्राप्त होते हैं उन्हें (हिनोमि) बढ़ाता हूँ, उस मुझे सब बढ़ावें ॥१२॥
भावार्थभाषाः - जिनके पिछले काम पुण्यरूप हैं, वे ही पवित्र जन्मवाले हैं अथवा जिनके वर्त्तमान में धर्मयुक्त आचरण हैं, वे पवित्रजन्मा होते हैं ॥१२॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सत्य ज्ञान से युक्त पुरुष

पदार्थान्वयभाषाः - पदार्थ - हे (मरुतः) = विद्वान् पुरुषो! (वः) = आप के (हव्या) = खाने, लेने-देने के पदार्थ (शुची) = पवित्र हों। मैं (शुचिभ्यः) = पवित्र पदार्थों की वृद्धि के लिये (शुचिं अध्वरं) = पवित्र यज्ञ की (हिनोमि) = वृद्धि करता हूँ। (ऋत-साप:) = सत्य के आधार पर प्रतिज्ञाबद्ध होनेवाले (शुचिजन्मान:) = शुद्ध जन्म धारण करनेवाले (शुचयः) = कर्म, वाणी में शुद्ध, (पावका:) = अग्निवत् तेजस्वी पुरुष (ऋतेन) = सत्य-ज्ञान से ही (सत्यम् आयन्) = सत्य व्यवहार को प्राप्त होते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- विद्वान् पुरुष सत्य ज्ञान से युक्त होकर अपने कर्म व वाणी में पवित्रता लाकर हृदय को शुद्ध बनावें। यज्ञ की वृद्धि कर समाज में शोधन करें। ये विद्वान् सत्य के साथ प्रतिज्ञाबद्ध होकर सत्य व्यवहार ही करें।
0 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

केऽत्र संसारे पवित्रा जायन्त इत्याह ॥

अन्वय:

हे पावका इव शुचयः शुचिजन्मान ऋतसापो मरुतः शुचीनां वो यानि शुची हव्यास्सन्ति तेभ्यः शुचिभ्यः शुचिमृतेन सत्यमध्वरं य आयँस्तानहं हिनोमि तं मां सर्वे वर्धयत ॥१२॥

पदार्थान्वयभाषाः - (शुची) शुचीनि पवित्राणि (वः) युष्माकम् (हव्या) दातुमादातुमर्हाणि (मरुतः) मरणधर्माणो मनुष्याः (शुचीनाम्) पवित्राचाराणाम् (शुचिम्) पवित्रम् (हिनोमि) वर्धयामि (अध्वरम्) अहिंसनीयं यज्ञम् (शुचिभ्यः) पवित्रेभ्यो विद्वद्भ्यः पदार्थेभ्यो वा (ऋतेन) यथार्थेन (सत्यम्) अव्यभिचारि नित्यम् (ऋतसापः) ये ऋतेन सपन्ति प्रतिज्ञां कुर्वन्ति ते (आयन्) आगच्छन्ति प्राप्नुवन्ति (शुचिजन्मानः) पवित्रजन्मवन्तः (शुचयः) पवित्राः (पावकाः) वह्नय इव वर्त्तमानाः ॥१२॥
भावार्थभाषाः - येषां प्राक्कर्माणि पुण्यात्मकानि सन्ति त एव पवित्रजन्मानोऽथवा येषां वर्तमाने धर्माचरणानि सन्ति ते पवित्रजन्मानो भवन्ति ॥१२॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O Maruts, mortals, pure are your yajnic transactions, clean your gifts, receipts and dispensations. I invoke and augment the pure and non-violent yajna of and love and creativity of the pure for the sake of pure and sacred people who, committed to truth, advance the truth by observance of truth and divine law of rectitude. Bright and pure is your birth and origin, pure you are and sanctifying.
0 बार पढ़ा गया

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - ज्यांचे पूर्व कर्म पुण्यरूप असते त्यांचा जन्म पवित्र असतो किंवा ज्यांना वर्तमानकाळात धर्मयुक्त आवरण असते त्यांना पवित्र जन्म मिळालेला असतो. ॥ १२ ॥