वांछित मन्त्र चुनें

याः प्र॒वतो॑ नि॒वत॑ उ॒द्वत॑ उद॒न्वती॑रनुद॒काश्च॒ याः। ता अ॒स्मभ्यं॒ पय॑सा॒ पिन्व॑मानाः शि॒वा दे॒वीर॑शिप॒दा भ॑वन्तु॒ सर्वा॑ न॒द्यो॑ अशिमि॒दा भ॑वन्तु ॥४॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yāḥ pravato nivata udvata udanvatīr anudakāś ca yāḥ | tā asmabhyam payasā pinvamānāḥ śivā devīr aśipadā bhavantu sarvā nadyo aśimidā bhavantu ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

याः। प्र॒ऽवतः॑। नि॒ऽवतः॑। उ॒त्ऽवतः॑। उ॒द॒न्ऽवतीः॑। अ॒नु॒द॒काः। च॒। याः। ताः। अ॒स्मभ्य॑म्। पय॑सा। पिन्व॑मानाः। शि॒वाः। दे॒वीः। अ॒शि॒प॒दाः। भ॒व॒न्तु॒। सर्वाः॑। न॒द्यः॑। अ॒शि॒मि॒दाः। भ॒व॒न्तु॒ ॥४॥

ऋग्वेद » मण्डल:7» सूक्त:50» मन्त्र:4 | अष्टक:5» अध्याय:4» वर्ग:17» मन्त्र:4 | मण्डल:7» अनुवाक:3» मन्त्र:4


0 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर मनुष्यों को किसका निवारण कर क्या सेवन करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (याः) जो (प्रवतः) जाने योग्य (निवतः) नीचे (उद्वतः) वा ऊपरले देशों को जाती हैं (याश्च) और जो (उदन्वतीः) जल से भरी वा (अनुदकाः) जलरहित हैं (ताः) वे (सर्वाः) सब (नद्यः) नदियाँ (अस्मभ्यम्) हमारे लिये (पयसा) जल से (पिन्वमानाः) सींचती हुईं वा तृप्त करती हुईं (अशिपदाः) भोजनादि व्यवहारों के लिये प्राप्त होती हुईं (देवीः) आनन्द देने और (शिवः) सुख करनेवाली (भवन्तु) हों और (अशिमिदाः) भोजन आदि स्नेह करनेवाली (भवन्तु) हों ॥४॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्यो ! जितना जल नदी आदि में जाता है और जितना मेघमण्डल में प्राप्त होता है, उतना सब होम से शुद्ध कर सेवो जिससे सर्वदा मङ्गल बढ़ कर दुःख का अच्छे प्रकार नाश हो ॥४॥ इस सूक्त में जल और ओषधी विष के निवारण से शुद्ध सेवन कहा, इससे इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह पचासवाँ सूक्त और सत्रहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

जल चिकित्सा

पदार्थान्वयभाषाः - पदार्थ-(याः) = जो नदियाँ (प्रवतः) = दूर देशों तक जानेवाली, (याः निवतः) = जो नीचे की ओर बहनेवाली, (याः उद्वतः) = जो ऊँचे की ओर जानेवाली, (उदन्वती:) = जो प्रचुर जलवाली, (याः च अनुदका:) = और जो जलरहित या अल्प जल की हैं (ताः) = वे (अस्मभ्यं) = हमारे लिये (पयसा) = जल से देश को सींचती हुईं (शिवाः भवन्तु) = कल्याणकारी हों (देवी:) = सुखप्रद, अन्नादि देनेवाली हों और (अशिपदा:) = भोजनार्थ सब प्रकार के अन्नोत्पादक हों और (सर्वाः नद्यः) = सब नदियें (अशिमिदाः भवन्तु) = अहिंसाकारिणी हों।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- कुशल वैद्य प्राकृतिक तत्त्वों से भी चिकित्सा करे। इनमें जल चिकित्सा द्वारा अनेक रोगों को दूर किया जा सकता है। जैसे कटिस्नान, पाँव स्नान, मेहन स्नान, रीढ स्नान आदि द्वारा प्रजा को नीरोग बनावें। नदियों के जल, नदियों के किनारे की मिट्टी व रेत आदि का भी चिकित्सा में उपयोग लेवें। अगले सूक्त का ऋषि वसिष्ठ और आदित्य देवता है।
0 बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनर्मनुष्यैः किं निवार्य किं सेवनीयमित्याह ॥

अन्वय:

याः प्रवतो निवत उद्वतो देशान् गच्छन्ति याश्चोदन्वतीरनुदकास्सन्ति ताः सर्वा नद्योऽस्मभ्यं पयसा पिन्वमाना अशिपदा देवीः शिवा भवन्तु अशिमिदा भवन्तु ॥४॥

पदार्थान्वयभाषाः - (याः) (प्रवतः) गमनार्हान् (निवतः) निम्नान् (उद्वतः) ऊर्ध्वान् देशान् (उदन्वतीः) उदकयुक्ताः (अनुदकाः) जलरहिताः (च) (याः) (ताः) (अस्मभ्यम्) (पयसा) उदकेन। पय इत्युदकनाम। (निघं०१.१२)। (पिन्वमानाः) सिञ्चमानाः प्रीणन्त्यः (शिवाः) सुखकर्यः (देवीः) आनन्दप्रदाः (अशिपदाः) भोजनादिव्यवहाराय प्राप्ताः (भवन्तु) (सर्वाः) (नद्यः) (अशिमिदाः) भोजनादिस्नेहकारिकाः (भवन्तु) ॥४॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्याः ! यावज्जलं नद्यादिषु गच्छति यावच्च मेघमण्डलं प्राप्नोति तावत्सर्वं होमेन शोधयित्वा सेवन्ताम्, यतः सर्वदा मङ्गलं वर्धित्वा दुःखप्रणाशो भवेदिति ॥४॥ अत्राबौषधीविषनिवारणेन शुद्धसेवनमुक्तमत एतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिर्वेद्या ॥ इति पञ्चाशत्तमं सूक्तं सप्तदशो वर्गश्च समाप्तः ॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - All streams of water, wind and energy, rushing, flowing, rising, on mountains, slopes and valleys or plains with abundant or lean content, may be for us full of nourishment, health giving, blissful and sparkling generous. May they ward off all disease, may they never be destructive.
0 बार पढ़ा गया

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - हे माणसांनो ! जितके जल नदी इत्यादीमध्ये जाते व जितके मेघमंडलातून प्राप्त होते ते सर्व यज्ञाने शुद्ध करून वापरा. ज्यामुळे सदैव कल्याण होऊन दुःखाचा चांगल्या प्रकारे नाश होतो. ॥ ४ ॥