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प्र व॒ इन्द्रा॑य॒ माद॑नं॒ हर्य॑श्वाय गायत। सखा॑यः सोम॒पाव्ने॑ ॥१॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pra va indrāya mādanaṁ haryaśvāya gāyata | sakhāyaḥ somapāvne ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्र। वः॒। इन्द्रा॑य। माद॑नम्। हरि॑ऽअश्वाय। गा॒य॒त॒। सखा॑यः। सो॒म॒ऽपाव्ने॑ ॥१॥

ऋग्वेद » मण्डल:7» सूक्त:31» मन्त्र:1 | अष्टक:5» अध्याय:3» वर्ग:15» मन्त्र:1 | मण्डल:7» अनुवाक:2» मन्त्र:1


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब बारह ऋचावाले इकतीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में मित्रों को मित्र के लिये क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (सखायः) मित्रो ! (वः) तुम्हारे (हर्यश्वाय) मनुष्य वा हरणशील घोड़े जिसके विद्यमान हैं उस (सोमपाव्ने) सोम पीनेवाले (इन्द्राय) परमैश्वर्यवान् के लिये (मादनम्) आनन्द तुम (प्र, गायत) अच्छे प्रकार गाओ ॥१॥
भावार्थभाषाः - जो मित्रजन अपने मित्रजनों को आनन्द उत्पन्न करते हैं, वे मित्र होते हैं ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सोमपान का अधिकारी

पदार्थान्वयभाषाः - पदार्थ- हे (सखायः) = मित्रो ! आप लोग (सोमपाव्ने) = सोम-पान करनेवाले यजमान, अर्थात् वीर्य का रक्षण करनेवाले ब्रह्मचारी, पुत्र और शिष्य के पालक गृहपति और आचार्य, ऐश्वर्य और अन्न के पालक राजन्य और वैश्य, योग द्वारा ब्रह्मज्ञान के पान करनेवाले मुमुक्षु और जगत् के पालक परमेश्वर, (हर्यश्वाय) = वेगवान् अश्वों, बलों के स्वामी (इन्द्राय) = ऐश्वर्यवान्, भूमिपालक, आत्मा, परमात्मा आदि के लिये (मादनं) = अतिहर्षजनक (प्र गायत) = वचन का उपदेश करो।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोम अर्थात् शरीर का सर्वश्रेष्ठ धातु रेत: को धारण करनेवाला ब्रह्मचारी योग द्वारा ब्रह्मज्ञान का पान करनेवाला मुमुक्षु ही ईश-प्राप्ति का अधिकारी होता है।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथ सखिभिर्मित्राय किं कर्त्तव्यमित्याह ॥

अन्वय:

हे सखायो ! वो युष्माकं हर्यश्वाय सोमपाव्न इन्द्राय मादनं यूयं प्रगायत ॥१॥

पदार्थान्वयभाषाः - (प्र) (वः) युष्माकम् (इन्द्राय) परमैश्वर्याय (मादनम्) आनन्दनम् (हर्यश्वाय) हरयो मनुष्या हरणशीला वा अश्वा यस्य सः (गायत) प्रशंसत (सखायः) सुहृदः (सोमपाव्ने) यः सोमं पिबति तस्मै ॥१॥
भावार्थभाषाः - ये सखायः स्वसखीनामानन्दं जनयन्ति ते सखायो भवन्ति ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O friends, sing exciting songs of celebration in honour of Indra, your leader, commander of dynamic forces who loves the nation’s honour and excellence and thirsts to celebrate the grandeur of it.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)

या सूक्तात इंद्र, विद्वान व राजा यांच्या कामाचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्व सूक्तार्थाबरोबर संगती जाणावी.

भावार्थभाषाः - जे मित्र आपल्या मित्रांना आनंद देतात तेच (खरे) मित्र असतात. ॥ १ ॥