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उ॒तो घा॒ ते पु॑रु॒ष्या॒३॒॑ इदा॑स॒न्येषां॒ पूर्वे॑षा॒मशृ॑णो॒र्ऋषी॑णाम्। अधा॒हं त्वा॑ मघवञ्जोहवीमि॒ त्वं न॑ इन्द्रासि॒ प्रम॑तिः पि॒तेव॑ ॥४॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

uto ghā te puruṣyā id āsan yeṣām pūrveṣām aśṛṇor ṛṣīṇām | adhāhaṁ tvā maghavañ johavīmi tvaṁ na indrāsi pramatiḥ piteva ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उ॒तो इति॑। घ॒। ते। पु॒रु॒ष्याः॑। इत्। आ॒स॒न्। येषा॑म्। पूर्वे॑षाम्। अ॒शृ॒णोः॒। ऋषी॑णाम्। अध॑। अ॒हम्। त्वा॒। म॒घ॒ऽव॒न्। जो॒ह॒वी॒मि॒। त्वम्। नः॒। इ॒न्द्र॒। अ॒सि॒। प्रऽम॑तिः। पि॒ताऽइ॑व ॥४॥

ऋग्वेद » मण्डल:7» सूक्त:29» मन्त्र:4 | अष्टक:5» अध्याय:3» वर्ग:13» मन्त्र:4 | मण्डल:7» अनुवाक:2» मन्त्र:4


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

कौन पढ़ानेवाले अतिश्रेष्ठ हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (मघवन्) विद्या ऐश्वर्य से सम्पन्न (इन्द्र) विद्या ऐश्वर्य देनेवाले विद्वान् ! जो आप (येषाम्) जिन (पूर्वेषाम्) पहिले जिन्होंने विद्या पढ़ी उन (ऋषीणाम्) ऋषि-जनों से वेदों को (अशृणोः) सुनो (उतो) और जो (पुरुष्याः) पुरुषों में सत्पुरुष (घा) ही (आसन्) होते हैं (ते) वे (नः) हमारे अध्यापक हों जिससे (त्वम्) आप हमारे (पितेव) पिता के समान (प्रमतिः) उत्तम बुद्धिवाले (असि) हैं इससे (अध) इसके अनन्तर (अहम्) मैं (त्वा) आपकी (इत्) ही (जोहवीमि) निरन्तर प्रशंसा करूँ ॥४॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जो विद्वान् पितृजन पुत्रों के समान विद्यार्थियों की पालना करते हैं, वे ही सत्कार करने और प्रशंसा करने योग्य होते हैं ॥४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

राजा बहुश्रुत हो

पदार्थान्वयभाषाः - पदार्थ- हे (इन्द्र) = ऐश्वर्य दात: ! (उतो घ) = और (येषाम्) = जिन (पूर्वेषां ऋषीणाम्) = पूर्व के, सत्य ज्ञान द्रष्टा जनों के ज्ञान को तू (अशृणो:) = सुनता है (ते इत्) = वे निश्चय से (पुरुष्याः) = आसन्मनुष्यों के हितकारी हैं। हे (मघवन्) = धनवन्! (अध) = और (अहं) = मैं (त्वा) = तुझे (जोहवीमि) = गुरु स्वीकार करता हूँ, (त्वं) = तू (प्रमतिः) = उत्तम ज्ञानी होकर (नः पिता इव असि) = हमारे पिता के समान है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- राष्ट्र में विविध विद्याओं के विद्वानों की एक मण्डली होवे। राजा उन विद्वानों से ज्ञान का श्रवण उसी प्रकार श्रद्धा से करे, जैसे पुत्र पिता से ज्ञान को सुनता है। इससे राजा बहुत विद्याओं को जानकर राष्ट्र में अध्यात्म तथा ज्ञान-विज्ञान की वृद्धि करे।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

केऽध्यापका वरतमाः सन्तीत्याह ॥

अन्वय:

हे मघवन्निन्द्र ! यस्त्वं येषां पूर्वेषामृषीणां सकाशाद्वेदानशृणोरुतो ये पुरुष्या घासँस्ते नोऽस्माकमध्यापकाः सन्तु यतस्त्वं नोऽस्माकं पितेव प्रमतिरसि तस्मादधाहं त्वेज्जोहवीमि ॥४॥

पदार्थान्वयभाषाः - (उतो) अपि (घ) एव। अत्र ऋचि तुनुघेति दीर्घः। (ते) (पुरुष्याः) पुरुषेषु साधवः (इत्) एव (आसन्) भवन्ति (येषाम्) (पूर्वेषाम्) पूर्वमधीतविद्यानाम् (अशृणोः) शृणुयाः (ऋषीणाम्) वेदार्थशब्दसम्बन्धविदाम् (अध) अथ (अहम्) (त्वा) त्वाम् (मघवन्) विद्यैश्वर्यसम्पन्न (जोहवीमि) भृशं प्रशंसामि (त्वम्) (नः) अस्माकम् (इन्द्र) विद्यैश्वर्यप्रद (असि) (प्रमतिः) प्रकृष्टप्रज्ञः (पितेव) जनकवत् ॥४॥
भावार्थभाषाः - अत्रोपमालङ्कारः । ये विद्वांसः पितरः पुत्रानिव विद्यार्थिनः पालयन्ति त एव सत्कर्तव्याः प्रशंसनीया भवन्ति ॥४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - And all songs and adorations of the seers of all time which you graciously listen and accept are but human adorations of the visionaries in your honour. I too, O lord of universal knowledge, vision and glory, offer the same song of invocation and adoration. O lord and master, Indra, you are our teacher, protector and provider like the father.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात उपमालंकार आहे. जे विद्वान पितृजन पुत्रांप्रमाणे विद्यार्थ्यांचे पालन करतात तेच सत्कार करण्यायोग्य व प्रशंसा करण्यायोग्य असतात. ॥ ४ ॥