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देवता: इन्द्र: ऋषि: वसिष्ठः छन्द: त्रिष्टुप् स्वर: धैवतः

ए॒ष स्तोमो॑ अचिक्रद॒द्वृषा॑ त उ॒त स्ता॒मुर्म॑घवन्नक्रपिष्ट। रा॒यस्कामो॑ जरि॒तारं॑ त॒ आग॒न्त्वम॒ङ्ग श॑क्र॒ वस्व॒ आ श॑को नः ॥९॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

eṣa stomo acikradad vṛṣā ta uta stāmur maghavann akrapiṣṭa | rāyas kāmo jaritāraṁ ta āgan tvam aṅga śakra vasva ā śako naḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ए॒षः। स्तोमः॑। अ॒चि॒क्र॒द॒त्। वृषा॑। ते॒। उ॒त। स्ता॒मुः। म॒घ॒ऽव॒न्। अ॒क्र॒पि॒ष्ट॒। रा॒यः। कामः॑। ज॒रि॒तार॑म्। ते॒। आ। अ॒ग॒न्। त्वम्। अ॒ङ्ग। श॒क्र॒। वस्वः॑। आ। श॒कः॒। नः॒ ॥९॥

ऋग्वेद » मण्डल:7» सूक्त:20» मन्त्र:9 | अष्टक:5» अध्याय:3» वर्ग:2» मन्त्र:4 | मण्डल:7» अनुवाक:2» मन्त्र:9


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर मनुष्य क्या करके किसको प्राप्त हों, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (शक्र) शक्तिमान् (अङ्ग) मित्र पुरुषार्थी राजन् ! जो (एषः) यह (ते) आपका (स्तोमः) प्रशंसा करने योग्य (उत) और (वृषा) बलिष्ठ जन (अचिक्रदत्) बुलावे वा हे (मघवन्) बहुत धनयुक्त ! (स्तामुः) स्तुति करनेवाला जन (अक्रपिष्ट) समर्थ होता है वा (ते) तुम्हारे लिये जो (रायः) धन की (कामः) कामना करनेवाला (जरितारम्) स्तुति करनेवाले आपको (आ, अगन्) सब ओर से प्राप्त हो वह (त्वम्) आप (नः) हमारे (वस्वः) धनों को (आ, शकः) सब ओर से सह सको ॥९॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्यो ! तुम जो शक्ति को बढ़ा कर धर्म कर्म से ऐश्वर्य आदि की प्राप्ति की अभिलाषा बढ़ाओ तो तुमको पुष्कल ऐश्वर्य प्राप्त हो ॥९॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

स्तवन से 'शक्ति व धन' की प्राप्ति

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (एषः) = यह (ते) = आपका (स्तोमः) = स्तुति समूह (अचिक्रदद्) = ऊँचे से उच्चारित होता है। (वृषा) = यह स्तोम सब सुखों का वर्षण करनेवाला है, (उत) = और हे (मघवन्) = ऐश्वर्यशालिन् प्रभो ! यह (स्तामुः) = स्तोता (अक्रपिष्ट) = खूब सामर्थ्यवान् होता है, आपके बल से यह बलवान् बनता है। [२] हे प्रभो ! (ते जरितारम्) = तेरे स्तोता को (रायस्कायः) = धन की अभिलाषा (आगन्) = प्राप्त हुई है। सो हे (शक्र) = सर्वशक्तिमन् प्रभो ! (त्वम्) = आप (अंग) = शीघ्र ही (नः) = हमारे लिये (वस्वः) = धन को (आशक:) = [धेहि ] धारण करिये।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम प्रभु के स्तोम का उच्चारण करते हैं, प्रभु हमें शक्तिशाली बनाते हैं। स्तोता को धन की कामना होती है, तो प्रभु उसे शीघ्र ही धन को प्राप्त कराते हैं।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनर्मनुष्याः किं कृत्वा किं प्राप्नुयुरित्याह ॥

अन्वय:

हे शक्राऽङ्ग पुरुषार्थि राजन् ! य एष ते स्तोम उत वृषाऽचिक्रदत्। हे मघवँस्तामुरक्रपिष्ट ते यो रायस्कामो जरितारं त्वामागन् स त्वं नो वस्व आशकः ॥९॥

पदार्थान्वयभाषाः - (एषः) (स्तोमः) प्रशंसनीयः (अचिक्रदत्) आह्वयेत् (वृषा) बलिष्ठः (ते) तव (उत) (स्तामुः) स्तावकः (मघवन्) बहुधनयुक्त (अक्रपिष्ट) कल्पते (रायः) श्रियः (कामः) कामनामभिलाषां कुर्व्वाणः (जरितारम्) स्तोतारम् (ते) तुभ्यम् (आ) (अगन्) समन्तात्प्राप्नोतु (त्वम्) (अङ्ग) सखे (शक्र) शक्तिमन् (वस्वः) धनानि (आ) (शकः) समन्ताच्छक्नुहि (नः) अस्मान् ॥९॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्या ! यूयं यदि शक्तिं वर्धयित्वा धर्म्येण कर्मेणैश्वर्यादिप्राप्तेरभिलाषां वर्धयेयुस्तर्हि युष्मान् पुष्कलमैश्वर्यं प्राप्नुयात् ॥९॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O lord of wealth, honour, power and excellence, this song of adoration vibrates with prayer for your attention and the celebrant prays for your grace. May your gift of wealth and fulfilment flow to the celebrant. O lord of power dear as breath of life, make it possible for us to win all wealth, honour and excellence we pray for.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - हे माणसांनो! तुम्ही शक्ती वाढवून धर्म कर्माने ऐश्वर्य प्राप्ती इत्यादीची अभिलाषा वाढवा. त्यामुळे तुम्हाला पुष्कळ ऐश्वर्य प्राप्त होईल. ॥ ९ ॥