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देवता: इन्द्र: ऋषि: वसिष्ठः छन्द: त्रिष्टुप् स्वर: धैवतः

पु॒रो॒ळा इत्तु॒र्वशो॒ यक्षु॑रासीद्रा॒ये मत्स्या॑सो॒ निशि॑ता॒ अपी॑व। श्रु॒ष्टिं च॑क्रु॒र्भृग॑वो द्रु॒ह्यव॑श्च॒ सखा॒ सखा॑यमतर॒द्विषू॑चोः ॥६॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

puroḻā it turvaśo yakṣur āsīd rāye matsyāso niśitā apīva | śruṣṭiṁ cakrur bhṛgavo druhyavaś ca sakhā sakhāyam atarad viṣūcoḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

पु॒रो॒ळाः। इत्। तु॒र्वशः॑। यक्षुः॑। आ॒सी॒त्। रा॒ये। मत्स्या॑सः। निऽशि॑ताः। अपि॑ऽइव। श्रु॒ष्टिम्। च॒क्रुः॒। भृग॑वः। द्रु॒ह्यवः॑। च॒। सखा॑। सखा॑यम्। अ॒त॒र॒त्। विषू॑चोः ॥६॥

ऋग्वेद » मण्डल:7» सूक्त:18» मन्त्र:6 | अष्टक:5» अध्याय:2» वर्ग:25» मन्त्र:1 | मण्डल:7» अनुवाक:2» मन्त्र:6


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर राजा किनका सत्कार करे, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे राजन् ! (राये) धन के लिये (तुर्वशः) शीघ्र वश करने और (पुरोळाः) आगे जाने (यक्षुः) दूसरों से मिलनेवाला (इत्) ही (आसीत्) है वा (च) और जो (मत्स्यासः) समुद्रों में स्थिर मछलियों के समान (अपीव) अतीव (निशिताः) निरन्तर तीक्ष्णस्वभायुक्त (भृगवः) परिपक्व ज्ञानवाले (द्रुह्यवः) दुष्टों की निन्दा करनेवाले (च) भी (श्रुष्टिम्) शीघ्रता (चक्रुः) करते हैं जो (सखा) मित्र (विषूचोः) विद्या और धर्म का सुन्दर शील जिनमें विद्यमान उन के (सखायम्) मित्र को (अतरत्) तरता है, उन सबों का आप सदा सत्कार करो ॥६॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । हे राजन् ! जो सब शुभ कर्म्मों में आगे, अच्छे प्रकार सिद्धि की उन्नति करनेवाले, बड़े मगरमच्छों के समान गम्भीर आशयवाले, शीघ्रकारी एक दूसरे में मित्रता रखनेवाले हों, उन अतीव बुद्धिमानों का सत्कार कर राज्यकार्य्यों में नियुक्त करो ॥६॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

पुरोडा का 'तुर्वश व यक्षु' होना

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (पुरोडाः इत्) = प्रथम दानशील ही दान देकर बचे हुए को ही खानेवाला व्यक्ति (तुर्वशः) = त्वरा से शत्रुओं को वश में करनेवाला तथा (यक्षुः) = यज्ञशील (आसीत्) = होता है। ये यज्ञशील व्यक्ति ही राये ऐश्वर्य प्राप्ति के लिये (निशिताः) = खूब तीक्ष्ण [तीव्र गतिवाले] होते हुए (अपि) = भी (मत्स्यासः इव) = जल में मछलियों के समान होते हैं, सदा इन धन के जलों में रहते हुए भी इन जलों में गल नहीं जाते। इन पर धन का घातक प्रभाव नहीं होता। [२] (भृगवः) = ज्ञानाग्नि में अपने को परिपक्क करनेवाले (द्रुह्यवः च) = और सब निन्दनीय बातों की जिघांसा करनेवाले उपासक (श्रुष्टिम्) = आशु प्राप्ति को ऐश्वर्य को [ Prosperity] (चक्रुः) = करनेवाले होते हैं। (सखावे) = सर्वमित्र प्रभु (सखायम्) = अपने इस सखा जीव को (विषूचो: अतरत्) = [विषूचु] से विविध खूब गतियों के करानेवाले लोभ से-गतमन्त्र के 'शिम्यु' से तरा देते हैं [अतारयत्] । ये लोग धन को तो प्राप्त करते हैं, परन्तु लोभवृत्ति से सदा दूर रहते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- देने की वृत्तिवाला पुरुष शत्रुओं को वश में करनेवाला व यज्ञशील बनता है। यह धन प्राप्ति में लगा हुआ भी धन में ही नहीं गल जाता ज्ञानी शत्रुहिंसक उपासक आवश्यक धन को प्राप्त करते हैं, प्रभु इन्हें लोभ से दूर रखते हैं।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुना राजा कान् सत्कुर्यादित्याह ॥

अन्वय:

हे राजन् ! राये यस्तुर्वशः पुरोळा यक्षुरिदासीद् ये मत्स्यासश्चाऽपीव निशिता भृगवो द्रुह्यवश्च श्रुष्टिं चक्रुर्यः सखा विषूचोः सखायमतरत् तानित्त्वं सदा सत्कुर्याः ॥६॥

पदार्थान्वयभाषाः - (पुरोळाः) पुरःसरः (इत्) एव (तुर्वशः) सद्यो वशङ्करः (यक्षुः) सङ्गन्ता (आसीत्) अस्ति (राये) धनाय (मत्स्यासः) समुद्रस्था मत्स्या इव (निशिताः) नितरां तीक्ष्णगतिस्वभावाः (अपीव) (श्रुष्टिम्) शीघ्रम् (चक्रुः) कुर्वन्ति (भृगवः) परिपक्वज्ञानाः (द्रुह्यवः) दुष्टानां निन्दकाः (च) (सखा) (सखायम्) सखायम् (अतरत्) तरति (विषूचोः) व्याप्तविद्याधर्मसुशीलयोर्द्वयोः ॥६॥
भावार्थभाषाः - अत्रोपमालङ्कारः । हे राजन् ! सर्वेषु शुभकर्मस्वग्रसंराधनोन्नतिकारका महामत्स्या इव गम्भीराशयस्थाः शीघ्रं कर्त्तारः परस्परस्मिन् सुहृदः स्युस्तानतीवप्रज्ञान् सत्कृत्य राज्यकार्येषु नियोजय ॥६॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The ruler is chief of all, all controller and instant achiever, keen yajaka and sociable with open doors, sharpest reacher to the target like fish in the ocean, for economic and social progress. Men of economic ambition, science and wisdom do him honour, enemies cower before him, and as a friend he saves and supports the friend of versatile genius.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात उपमालंकार आहे. हे राजा ! जे शुभ गुणात अग्रणी, सिद्धीची पूर्तता करणारे, मगरीप्रमाणे गंभीर, आशययुक्त, गतिमान, परस्पर मैत्री करणारे असतील तर त्या अति बुद्धिमानांचा सत्कार करून राज्यकार्यात नियुक्त कर. ॥ ६ ॥