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इन्द्रा॑सोमा व॒र्तय॑तं दि॒वस्पर्य॑ग्नित॒प्तेभि॑र्यु॒वमश्म॑हन्मभिः । तपु॑र्वधेभिर॒जरे॑भिर॒त्रिणो॒ नि पर्शा॑ने विध्यतं॒ यन्तु॑ निस्व॒रम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

indrāsomā vartayataṁ divas pary agnitaptebhir yuvam aśmahanmabhiḥ | tapurvadhebhir ajarebhir atriṇo ni parśāne vidhyataṁ yantu nisvaram ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इन्द्रा॑सोमा । व॒र्तय॑तम् । दि॒वः । परि॑ । अ॒ग्नि॒ऽत॒प्तेभिः॑ । यु॒वम् । अश्म॑हन्मऽभिः । तपुः॑ऽवधेभिः । अ॒जरे॑भिः । अ॒त्रिणः॑ । नि । पर्शा॑ने । वि॒ध्य॒त॒म् । यन्तु॑ । नि॒ऽस्व॒रम् ॥ ७.१०४.५

ऋग्वेद » मण्डल:7» सूक्त:104» मन्त्र:5 | अष्टक:5» अध्याय:7» वर्ग:5» मन्त्र:5 | मण्डल:7» अनुवाक:6» मन्त्र:5


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्रासोमा) हे न्यायकारी परमात्मन् ! (युवम्) आप (अग्नितप्तेभिः) अग्नि से तपाये हुए (तपुर्वधेभिः) तापों के नाशनेवाले (अजरेभिः) जो कि बड़े दृढ़ हैं, ऐसे (अश्महन्मभिः) वज्रों से (दिवस्परि) अन्तरिक्षस्थल से (वर्तयतम्) शत्रुओं को आच्छादन करो और (अत्रिणः) अन्याय से भक्षण करनेवालों को (पर्शाने) दोनों ओर से घेर कर (निविध्यतम्) ऐसी ताड़ना करो, जिससे कि (निस्वरम्) शब्दहीन होकर (यन्तु) भाग जायें ॥५॥
भावार्थभाषाः - भाव यह है कि अन्यायकारी दुष्टों के दमन करने को परमात्मा अनेक प्रकार कथन करते हैं ॥५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

आकाश से दुष्टों पर अस्त्र प्रहार

पदार्थान्वयभाषाः - पदार्थ - हे (इन्द्रासोमा) = राजन् ! शासक जन! (युवम्) = आप दोनों (अग्नि-तप्तेभिः) = अग्नि से तपे हुए, (अश्म-हन्मभिः) = मेघ से विद्युत् तुल्य आघात करनेवाले (तपुर्वधेभिः) = दुष्ट नाशक अस्त्रों से (दिवः परि) = आकाश से दूर से ही मार कर (अत्रिणः) = प्रजा नाशक दुष्ट पुरुष के (पर्शाने) = दोनों पासों के बल समुदाय को (नि विध्यतम्) = छिन्न-भिन्न करो। जिससे वह (निः-स्वरम्) = बिना आवाज किये, बिना कष्ट पहुँचाये (यन्तु) = चला जावे।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- राजा दुष्ट-नाशक अस्त्रों को वायुसेना में सम्मिलित करे। इससे दुष्ट व शत्रुओं पर आकाश से ही अस्त्रों का प्रहार करके दुष्ट पुरुषों की शक्ति का नाश कर दे। तब वह दुष्ट शक्तिहीन होकर स्वयं ही भाग जाएगा।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्रासोमा) हे न्यायकारिन् भगवन् ! (युवम्) भवान् (अग्नितप्तेभिः) अग्निसंसर्गाद्दन्दह्यमानैः (तपुर्वधेभिः) तापनाशकैः (अजरेभिः) अच्छेद्यैः (अश्महन्मभिः) इत्थं भूतैर्वज्रैः (दिवस्परि) अन्तरिक्षात् (वर्तयतम्) शत्रूनाच्छादयतु, तथा (अत्रिणः) अन्यायेन भक्षणशीलान् (पर्शाने) उभयोः पार्श्वयोरावृत्य (निविध्यतम्) इत्थं ताडयतु येन (निस्वरम्, यन्तु) तूष्णीं पलायन्ताम् ॥५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra-Soma, lord of power and force, lord of peace and harmony, turn all round, revolve your search lights and from the skies shoot out your weapons of defence and offence, and with fiery, thunder-tipped, fatally destructive, irresistible and inviolable weapons fix the voracious ogres, strike them on the precipice and throw them into the abyss, running off into silence and oblivion without uttering a sigh of pain or voice of protest.