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यो माया॑तुं॒ यातु॑धा॒नेत्याह॒ यो वा॑ र॒क्षाः शुचि॑र॒स्मीत्याह॑ । इन्द्र॒स्तं ह॑न्तु मह॒ता व॒धेन॒ विश्व॑स्य ज॒न्तोर॑ध॒मस्प॑दीष्ट ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yo māyātuṁ yātudhānety āha yo vā rakṣāḥ śucir asmīty āha | indras taṁ hantu mahatā vadhena viśvasya jantor adhamas padīṣṭa ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यः । मा॒ । अया॑तुम् । यातु॑ऽधा॒न । इति॑ । आह॑ । यः । वा॒ । र॒क्षाः । शुचिः॑ । अ॒स्मि॒ । इति॑ । आह॑ । इन्द्रः॑ । तम् । ह॒न्तु॒ । म॒ह॒ता । व॒धेन॑ । विश्व॑स्य । ज॒न्तोः । अ॒ध॒मः । प॒दी॒ष्ट॒ ॥ ७.१०४.१६

ऋग्वेद » मण्डल:7» सूक्त:104» मन्त्र:16 | अष्टक:5» अध्याय:7» वर्ग:8» मन्त्र:1 | मण्डल:7» अनुवाक:6» मन्त्र:16


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यः) जो राक्षस (मा) मुझको (अयातुं, यातुधानेत्याह) राक्षस कहता है और (यः) जो (रक्षाः) राक्षस होकर (शुचिरस्मि) मैं पवित्र हूँ, (इत्याह) ऐसा कहता है (इन्द्रः) परमात्मा (तं) उस साधु को असाधु कहनेवाले को और अपने आपको असाधु होकर साधु कहनेवाले को (महता, वधेन) तीक्ष्ण शस्त्र से (विश्वस्य) संसार के ऐसे (जन्तोः) जो (अधमः) अधम हैं, परमात्मा (पदीष्ट) नाश करे ॥१६॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे जीवो ! तुम में से जो पुरुष सदाचारियों को मिथ्या ही दूषित करते हैं और स्वयं दम्भी बनकर सदाचारी, सत्यवादी और सत्यमानी बनते हैं, न्यायकारी राजाओं का काम है कि ऐसे पुरुषों को यथायोग्य दण्ड दें ॥१६॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

असत्य आरोप लगानेवाले को दण्ड

पदार्थान्वयभाषाः - पदार्थ - (यः) = जो (अयातुं मा) = अन्य को पीड़ा न देनेवाले मुझको यातुधान (इति आह) ='पीड़ा देनेवाला' ऐसा कहे (वा) = और (यः) = जो (रक्षाः) = स्वयं दुष्ट पुरुष होकर (शुचिः अस्मि इति आह) = मैं निर्दोष हूँ, ऐसा कहे (इन्द्रः) = राजा (तं) = उसको (महता वधेन) = बड़े भारी शस्त्र से (हन्तु) = मारे और वह (विश्वस्य जन्तोः) = समस्त पापियों से (अधमः) = नीचा पदीष्ट समझा जावे।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-यदि कोई दुष्ट निर्दोष लोगों पर पीड़ित करने का झूठा दोष लगावे या दोषी होकर भी स्वयं को निर्दोष बतावे ऐसे धूर्त को शस्त्र के प्रहार से [कोड़े आदिलगाकर] शासकवर्ग दण्डित करे।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यः) यो दुष्टः (मा) माम् (अयातुम्) अदण्ड्यं (यातुधानेति) यातुधानोऽसीति (आह) कथयति (वा) यद्वा (यः, रक्षाः) राक्षसः (शुचिः) अपवित्रः (अस्मि, इति, आह) अस्मीति कथयति (तम्) तादृशं राक्षसं (इन्द्रः) परमात्मा (महता, वधेन) महता दिव्येन शस्त्रेण (हन्तु) हिनस्तु (विश्वस्य, जन्तोः) सर्वेभ्यो जन्तुभ्यः (अधमः) नीचः सन् (पदीष्ट) नश्यतु सः ॥१६॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Whoever says that I am a devil even though I am not a devil, and whoever says that he is innocent and immaculate even though he is a devil, may Indra, lord of power and justice, punish such a person with his mighty thunderbolt. May such a falsifier fall to the abyss as the worst of all living beings.