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गोमा॑यु॒रेको॑ अ॒जमा॑यु॒रेक॒: पृश्नि॒रेको॒ हरि॑त॒ एक॑ एषाम् । स॒मा॒नं नाम॒ बिभ्र॑तो॒ विरू॑पाः पुरु॒त्रा वाचं॑ पिपिशु॒र्वद॑न्तः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

gomāyur eko ajamāyur ekaḥ pṛśnir eko harita eka eṣām | samānaṁ nāma bibhrato virūpāḥ purutrā vācam pipiśur vadantaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

गोऽमा॑युः । एकः॑ । अ॒जऽमा॑युः । एकः॑ । पृश्निः॑ । एकः॑ । हरि॑तः । एकः॑ । ए॒षा॒म् । स॒मा॒नम् । नाम॑ । बिभ्र॑तः । विऽरू॑पाः । पु॒रु॒ऽत्र । वाच॑म् । पि॒पि॒शुः॒ । वद॑न्तः ॥ ७.१०३.६

ऋग्वेद » मण्डल:7» सूक्त:103» मन्त्र:6 | अष्टक:5» अध्याय:7» वर्ग:4» मन्त्र:1 | मण्डल:7» अनुवाक:6» मन्त्र:6


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आर्यमुनि

उक्त वाणी के एकत्व को निम्नलिखित मन्त्र से भलीभाँति वर्णन करते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (एषाम्) इन जलजन्तुओं में (एकः, गोमायुः) एक तो गौ के समान स्वर से बोलता है और (एकः, अजमायुः) दूसरा कोई अजा के समान स्वरवाला है और (पृश्निः, एकः) कोई-कोई विचित्र वर्णवाला और (एकः, हरितः) कोई हरित वर्ण का है, तथा (पुरुत्रा) बहुत से भेदवाले छोटे-बड़े (विरूपाः) अनेक रूपवाले होकर भी (समानं, नाम, बिभ्रतः) एक नाम को धारण करते हुए (वाचम्, वदन्तः) और एक ही वाणी को बोलते हुए (पिपिशुः) प्रकट होते हैं ॥६॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा उपदेश करते हैं कि जिस प्रकार जन्तु भी स्वरभेद, आकारभेद और वर्णभेद रखते हुए जातिभेद और वाणीभेद नहीं रखते, इस प्रकार हे मनुष्यों ! तुमको प्राकृत जन्तुओं से शिक्षा लेकर भी वाणी का एकत्व और जाति का एकत्व दृढ़ करना चाहिये। जो पुरुष वाणी के एकत्व को और जाति के एकत्व को दृढ़ नहीं रख सकता, वह अपने मनुष्यत्व को भी नहीं रख सकता ॥६॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

विद्वानों की विभिन्न श्रेणियाँ

पदार्थान्वयभाषाः - पदार्थ - (एषाम्) = इन विद्वानों में से (एकः) = एक (गो-मायुः) = वेदवाणियों के प्रवचन में समर्थ होता है। (एकः अज-मायु:) = एक विद्वान् अजन्मा, परमेश्वर के प्रवचन में समर्थ है। एक (पृश्निः) = एक प्रश्नोत्तर करने में कुशल है। एक (हरितः) = एक ज्ञानों को ग्रहण करने में कुशल है। ये सब (समानं) = एक समान (नाम) ='ब्राह्मण' 'विद्वान्' नाम धारण करते हुए भी (वि-रूपाः) = विविध विद्याओं को धारण करते हैं। वे (वदन्तः) = प्रवचन करते हुए (पुरुत्रा वाचं पिपिशुः) = नाना प्रकार से वाणी को प्रकट करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- राष्ट्र में कुछ विद्वान् वेदवाणी का प्रवचन करें, कुछ योगी बनकर योग सिखावें तथा परमात्मा का साक्षात्कार करावें, कुछ शोध करें, कुछ ज्ञान ग्रहण करके विभिन्न विद्याओं पर प्रयोग करें। इस प्रकार राष्ट्र में विविध विद्याओं का प्रचार होकर राष्ट्र समृद्ध बनेगा।
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आर्यमुनि

उक्तवचस एकत्वमधस्तेन मन्त्रेण सम्यग् निरूप्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - (एषाम्) एषां जलजन्तूनां मध्ये (एकः, गोमायुः) कश्चित् गौरिव शब्दं करोति तथा (एकः, अजमायुः) कश्चिदजवन्नदति (पृश्निः, एकः) कश्चित्तेषु पृश्निवर्णः (एकः हरितः) कश्चिद्धरितवर्णः तथा (पुरुत्रा, विरूपाः) विविधवर्णा विविधाकृतय एते (समानम्, नाम, बिभ्रतः) एकमेव नाम धारयन्तः (वाचम्, वदन्तः) समानामेव वाचं ब्रुवन्तः (पिपिशुः) आविर्भवन्ति ॥६॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - One of them croaks like a cow, another like a goat, one of them is spotted, another is green. Of different voice and colour, they bear the same one name, the “manduka”, the celebrant, but they seem to communicate in many different languages.