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अ॒न्यो अ॒न्यमनु॑ गृभ्णात्येनोर॒पां प्र॑स॒र्गे यदम॑न्दिषाताम् । म॒ण्डूको॒ यद॒भिवृ॑ष्ट॒: कनि॑ष्क॒न्पृश्नि॑: सम्पृ॒ङ्क्ते हरि॑तेन॒ वाच॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

anyo anyam anu gṛbhṇāty enor apām prasarge yad amandiṣātām | maṇḍūko yad abhivṛṣṭaḥ kaniṣkan pṛśniḥ sampṛṅkte haritena vācam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒न्यः । अ॒न्यम् । अनु॑ । गृ॒भ्णा॒ति॒ । ए॒नोः॒ । अ॒पाम् । प्र॒ऽस॒र्गे । यत् । अम॑न्दिषाताम् । म॒ण्डूकः॑ । यत् । अ॒भिऽवृ॑ष्टः । कनि॑स्कन् । पृश्निः॑ । स॒म्ऽपृ॒ङ्क्ते । हरि॑तेन । वाच॑म् ॥ ७.१०३.४

ऋग्वेद » मण्डल:7» सूक्त:103» मन्त्र:4 | अष्टक:5» अध्याय:7» वर्ग:3» मन्त्र:4 | मण्डल:7» अनुवाक:6» मन्त्र:4


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यत्) जब (अपाम्, प्रसर्गे) वृष्टि होती है, तब (एनोः) इसमें से (अन्यः, मण्डूकः) एक जलजन्तु (अन्यम्, अनुगृभ्णाति) दूसरे के समीप जाकर बैठता है और (अमन्दिषाताम्) दोनों हर्षित होते हैं तथा (यत्) जब (अभिवृष्टः) यह अभिषिक्त होता है, तब यह (पृश्निः, कनिष्कन्) चित्रवर्णवाला कूदता हुआ (हरितेन, वाचम्, संपृङ्क्ते) दूसरे स्फूर्तिवाले के साथ वाणी को संयोजित करता है ॥४॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे जीवो ! तुम प्रकृतिसिद्ध वर्षा आदि ऋतुओं में नूतन-नूतन भावों को ग्रहण करनेवाले जल-जन्तुओं से शिक्षा लाभ करो कि वे जिस प्रकार हर्षित होकर उद्योगी बनते हैं, इसी प्रकार तुम भी उद्योगी बनो ॥४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

विद्या का दान

पदार्थान्वयभाषाः - पदार्थ- जैसे (अपां प्रस) = जलों के खूब हो जाने पर (यत् अमन्दिषाताम्) = जब दो मेंढक प्रसन्न हो जाते हैं (अन्यः अन्यम् अनुगृभ्णाति) = एक दूसरे को पकड़ लेता है, (कनिष्कन् मंडूकः पृश्निः हरितेन वाचं सम्पृङ्गे) = पीला, कूदता मेंढक हरे मेंढक से अपनी आवाज मिला है वैसे ही (यत्) = जब (अपां प्रसर्गे) = आप्त वेदज्ञानों के देने के लिये गुरु-शिष्य दोनों (अमन्दिषाताम्) = प्रसन्न हो जाते हैं (एनो:) = इन गुरु और शिष्य में से (अन्यः) = एक गुरु, (अन्यम्) = दूसरे को (अनुगृभ्णाति) = अनुग्रहपूर्वक स्वीकार करता है और (यत्) = जो (अभिवृष्ट:) = अभिषेचित विद्याव्रत-स्नातक (मण्डूकः) = हर्षवान् होकर (कनिष्कन्) = विद्या प्रदान करता है तब (पृश्नि:) = वेद का विद्वान् (हरितेन) = ज्ञान-ग्राहक शिष्य से (वाचम् संपृक्ते) = अपनी वाणी का सम्पर्क कराता है, उसे ज्ञान देता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- गुरुजन अपने ब्रह्मचारी शिष्यों के साथ मिलकर अनुग्रहपूर्वक विद्या प्रदान करते हैं। तब ये शिष्य विद्याव्रत-स्नातक होकर प्रसन्नतापूर्वक समावर्त्तित होकर जाते हैं। अब ये विद्वान् भी अपने समीप आनेवाले शिष्यों को विद्या का दान करें।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यत्) यदा (अपाम्, प्रसर्गे) वृष्टिर्भवति तदा (एनोः) अनयोर्मध्यात् (अन्यः मण्डूकः) एको जलजन्तुः (अन्यम्, अनुगृभ्णाति) द्वितीयमुपेत्योपविशति, तथा (अमन्दिषाताम्) उभावपि सञ्जातहर्षौ भवतः (यत्) यदा च (अभिवृष्टः) अभिसिक्तो भवति तदा (पृश्निः कनिष्कन्) कश्चित्पृश्निवर्ण उत्प्लवमानः (हरितेन, वाचम्, सम्पृङ्क्ते) केनचिद्धरितवर्णेन स्ववाचं संयोजयति ॥४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - On the fall of divine showers they seize upon each other while both experience the ecstasy of meeting and the rain. When the celebrant is soaked in the rain, the spotted versatile one springs forward and communicates with the green one in concentration in the language of intimacy.