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तस्मा॒ इदा॒स्ये॑ ह॒विर्जु॒होता॒ मधु॑मत्तमम् । इळां॑ नः सं॒यतं॑ करत् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tasmā id āsye havir juhotā madhumattamam | iḻāṁ naḥ saṁyataṁ karat ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

तस्मै॑ । इत् । आ॒स्ये॑ । ह॒विः । जु॒होत॑ । मधु॑मत्ऽतमम् । इळा॑म् । नः॒ । स॒म्ऽयत॑म् । क॒र॒त् ॥ ७.१०२.३

ऋग्वेद » मण्डल:7» सूक्त:102» मन्त्र:3 | अष्टक:5» अध्याय:7» वर्ग:2» मन्त्र:3 | मण्डल:7» अनुवाक:6» मन्त्र:3


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (आस्ये) उस सर्वोपरि मुख्य परमात्मा में (मधुमत्तमं) अतिशय आह्लाद करनेवाले (हविः) हवि को (जुहोत) हवन करो और (तस्मै, इत्) उसी के लिये ही प्रार्थना करो कि वह (नः) हमको (इळां, संयतं) परिपूर्ण ऐश्वर्य (करत्) दे ॥३॥
भावार्थभाषाः - एकमात्र वही परमात्मा ऐश्वर्यों के लिये प्रार्थनीय है, अन्य नहीं ॥३॥यह १०२वाँ सूक्त और दूसरा वर्ग समाप्त हुआ ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

यज्ञ

पदार्थान्वयभाषाः - पदार्थ - जो परमेश्वर वा गुरु (नः) = हमारे (आस्ये) = मुख में (इडाम्) = वाणी को (संयतं) = सुनियन्त्रित (करत्) = करता है (तस्मै इत्) = उसी के गुणगान के लिये (आस्ये) = मुख में (मधुमत्-तमम्) = अत्यन्त मधुर गुण युक्त (हविः) = वचन (जुहोत) = धारण करो। ऐसे ही जो प्रभु मेघ तुल्य (नः इडां संयतं करत्) = हमें नियम से अन्न देता है उसके लिये मधुर हवि को (आस्ये) = छिन्न-भिन्न करके दूर तक फैला देनेवाले अग्नि में (हविः) = मधुर अन्नादि चरु प्रदान करो।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- मनुष्य लोग परमेश्वर द्वारा प्रदान की गई वाणी से उसकी ही महिमा का गान= स्तुति करे और उसके द्वारा प्रदत्त अन्न - औषध आदि को अग्नि में आहुति देकर यज्ञ किया करें। इससे जीवन में सुख-शान्ति की वृद्धि होगी। आगामी सूक्त का ऋषि वसिष्ठ व देवता मण्डूका है।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (आस्ये) तस्मिन् सर्वातिरिक्ते परमात्मनि (मधुमत्तमम्) नितान्ततृप्तिकारकं (हविः) हव्यं (जुहोत) जुहुत तथा च (तस्मै, इत्) तमेव प्रार्थयध्वं यतः सः (नः) अस्मभ्यं (इळां संयतम्) सकलमैश्वर्यं (करत्) ददातु ॥३॥इति द्व्युत्तरशततमं सूक्तं द्वितीयो वर्गश्च समाप्तः ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - To him, the omnipotent omnificent Parjanya, life bearing cloud, offer the sweetest oblations into the fiery mouth of the yajna vedi with selfless surrender of love and non-violence so that he may keep and help us keep the unity and integrity of the earth and environment well in order and maintain the integrity and harmony of humanity and culture in a state of creativity and progressive continuity of a familial order.