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स्त॒रीरु॑ त्व॒द्भव॑ति॒ सूत॑ उ त्वद्यथाव॒शं त॒न्वं॑ चक्र ए॒षः । पि॒तुः पय॒: प्रति॑ गृभ्णाति मा॒ता तेन॑ पि॒ता व॑र्धते॒ तेन॑ पु॒त्रः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

starīr u tvad bhavati sūta u tvad yathāvaśaṁ tanvaṁ cakra eṣaḥ | pituḥ payaḥ prati gṛbhṇāti mātā tena pitā vardhate tena putraḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

स्त॒रीः । ऊँ॒ इति॑ । त्व॒त् । भव॑ति । सूतः॑ । ऊँ॒ इति॑ । त्व॒त् । य॒था॒ऽव॒शम् । त॒न्व॑म् । च॒क्रे॒ । ए॒षः । पि॒तुः । पयः॑ । प्रति॑ । गृ॒भ्णा॒ति॒ । मा॒ता । तेन॑ । पि॒ता । व॒र्ध॒ते॒ । तेन॑ । पु॒त्रः ॥ ७.१०१.३

ऋग्वेद » मण्डल:7» सूक्त:101» मन्त्र:3 | अष्टक:5» अध्याय:7» वर्ग:1» मन्त्र:3 | मण्डल:7» अनुवाक:6» मन्त्र:3


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आर्यमुनि

अब पर्जन्य को धेनुरूप से वर्णन करते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (त्वत्) एक तो मेघ (स्तरीः) नवप्रसूता धेनु के समान (उ) निश्चय करके (भवति) होता है और (सूते) जल को वर्षता है, (त्वत्) अन्य (एषः) यह (यथावशम्) स्वेच्छापूर्वक (तन्वम्) शरीर को (चक्रे) बना लेता है, (पितुः) पितारूप द्युलोक से (माता, पयः प्रति, गृभ्णाति) मातारूप पृथिवी जल को ग्रहण करती है, (तेन) और तिससे (पिता, वर्धते) द्युलोक वृद्धि को प्राप्त होता है, (तेन) और तिससे (पुत्रः) प्राणिसङ्घरूप पुत्र भी बढ़ता है ॥३॥
भावार्थभाषाः - वर्षाऋतु में मेघ नवप्रसूता गौ के समान अपने दुग्धरूपी पयःपुञ्ज से संसार को परिपूर्ण कर देता है, वा यों कहो कि द्यु पिता और पृथिवी मातास्थानी बनकर वर्षाऋतु में नाना प्रकार की  सम्पत्ति उत्पन्न करते हैं और जो यहाँ पितास्थानी द्युलोक का बढ़ना कथन किया गया है, वह उसके ऐश्वर्य के भाव से है, कुछ आकारवृद्धि के अभिप्राय से नहीं ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु के दो रूप

पदार्थान्वयभाषाः - पदार्थ- (त्वत्) = मेघ का एकरूप (स्तरीः) = उन प्रसवनेवाली गौ तुल्य होता है, (सूते त्वत्) = उसका एक रूप प्रसवशील गौ के तुल्य जल-धाराएँ उत्पन्न करता है। (एषः यथावशं तन्वं चक्रे) = वह सूर्य-कान्ति के अनुसार अपना व्यापक रूप बना लेता है। वह (पितुः पयः प्रतिगृभ्णाति) = सूर्य रूप पिता जल ग्रहण करता और (तेन) = उससे माता-पृथिवी भी जल ग्रहण करती है। (तेन) = उस जल से (पिता वर्धते) = सूर्य महिमा से बढ़ता और (तेन पुत्रः वर्धते) = उसी जल से पुत्रवत् ओषधि, वनस्पति तथा जीवादि भी बढ़ते हैं। वैसे ही हे प्रभो ! (त्वत्) = तेरा एक रूप (स्तरी: भवति उ) = सर्वाच्छादक होता है और (त्वत्) = दूसरा रूप (सूते उ) = जगत् को उत्पन्न करता है। (यथावशं) = जितनी इच्छा होती है उतना ही (एषः) = वह परमेश्वर (तन्वं) = अपना विस्तृत संसार चक्रे बनाता है। (माता) = जैसे माता (पितुः) = पिता से (पयः प्रतिगृभ्णाति) = वीर्य ग्रहण कर गर्भ धारण करती है और उससे (पिता पुत्रः वर्धते) = पिता का वंश, पुत्र बढ़ता है। वैसे ही (पितुः) = सर्वपालक पिता से ही माता - सर्वनिर्मात्री प्रकृति (पयः) = वीर्य, शक्ति को प्रति (गृभ्णाति) = प्रति सर्ग ग्रहण करती है और (तेन) = उससे ही पिता-प्रभु-महिमा (वर्धते) = बढ़ती है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- परमात्मा के दो रूप हैं पहला रूप है जो सृष्टि के सब पदार्थों को आच्छादित करता है और दूसरा रूप है जगत् की उत्पत्ति करना। जितना आवश्यक है उतना ही संसार प्रभु बनाते हैं। जड़ प्रकृति को वह अपनी शक्ति प्रदान करता है जिससे सृष्टि बनती है। इस सृष्टिरचना से ही प्रभु की महिमा बढ़ती है।
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आर्यमुनि

अथ पर्जन्यं धेनुरूपेण वर्णयति।

पदार्थान्वयभाषाः - (त्वत्) एको मेघः (स्तरीः) नवप्रसूता गौरिव (उ, भवति) निश्चितं भवति तथा (सूते) वर्षत्यपि (त्वत्) अन्यः (एषः) असौ मेघः (यथावशम्) यथाकामं (तन्वम्) स्वशरीरं (चक्रे) रचयति च (पितुः) पितुरिव दिवः (माता, पयः, प्रतिगृभ्णाति) मातेव पृथ्वी जलमादत्ते (तेन) तेन जलादानेन (पिता, वर्धते) द्यौः, प्रकाशते (तेन) तेनैव हेतुना (पुत्रः) प्राणिसङ्घ एव पुत्रोऽपि समेधते ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - By virtue of you the heifer becomes fertilized, from you this soul assumes the body form it takes according to its latencies, the mother receives the shower of fertility from the father, by which, again, the father receives extension of the self and the off spring grows in body.